तोड़ने की संस्कृति

हाल ही में मूर्ति तोड़ने की सत्ता सहमत प्रवृत्ति दिखलाई दी. त्रिपुरा चुनावों में भाजपा की अभूतपूर्व जीत ने उसे उन्मादी बना दिया और जीत के तीसरे दिन लेनिन की मूर्त्ति बुलडोजर से ढ़ा दी गई. याद रहे कि इसी उन्माद का इस्तेमाल बाबरी मस्जिद ढाने में भी किया गया था. यानि सरकारी सहमति से ही यह काम हो सकता था. इसके बाद तमिलनाडु में पेरियार, और उ.प्र. में अम्बेडकर की मूर्त्तियों पर हमला हुआ. उपरोक्त सभी अपनी-अपनी विचारधारा के प्रखर समर्थक रहे और एक समय में जनता के आदर्श भी रहे. बाद में कोलकाता में हिंदू महासभा के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को भी कुछ लोगों ने क्षतिग्रस्त कर दिया. 

अफगानिस्तान के बामियान प्रांत में तालिबान ने सत्ता में आते ही सदियों से खड़ी विश्व प्रसिद्ध धरोहर बुद्ध की मूर्ति को अपनी घृणा का निशाना बनाया और आज ‘तालिबानी एक्शन’ सत्ता के उन्माद का नाम बन गया है. 

पिछले दिनों जो कुछ हुआ, उसपर प्रतिक्रिया भी आई. सरकारी तौर पर इसकी निंदा की गई और दोषियों को नहीं बख्शेंगे ऐसी घोषणा भी की गई. पर यह तब जबकि सात लोगों को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्त्ति तोड़ने के आरोप में पकड़कर जेल भेजा गया. परंतु बुलडोजर का इस्तेमाल करने वालों को क्यों बख्श दिया गया ? उन्हें आनंद उत्सव मनाने के लिए क्यों छोड़ दिया गया ? 

एक दैनिक अखबार के संपादकीय के अनुसार विचार में कि ‘अतीत के तहखाने में पहुंच चुकी इस शख्सियत (लेनिन) की मूर्त्ति को ऐसा करके वे उसे वर्तमान में एक बेवजह प्रासंगिकता... दे रहे हैं’ सही टिप्पणी नहीं है. लेनिन और उनकी विचारधारा, उनकी परंपरा हमेशा सार्थक और जिंदा रहेंगी. सामाजिक परिवर्तनों से जुड़ी यह धारा कहीं न कहीं अपनी दस्तक दे रही है, नेपाल इसका गवाह है. यह बात संघ परिवार के लोग भी जानते हैं, इसीलिए डरते हैं और मार्क्सवादी धारा का नामोनिशान मिटाना चाहते हैं.

 ‘तोड़ने की संस्कृति’ शीर्षक बेमानी नहीं है. ’90 के दशक से हिंदुत्व का उभार भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को तोड़ने में प्रयासरत रहा है. रामलला का मंदिर बनाने के नाम पर और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दौर को याद करने पर आज भी आम आदमी सिहर उठता है. गुजरात में 2002 के गोधरा कांड के बाद के दंगों ने हिंदुस्तान के आर्थिक ताने-बाने और सामाजिक सद्भाव के वातावरण को तोड़ने की स्थिति में ला दिया.

मोदी सरकार के आने के बाद भारत की सामाजिक संस्कृति की संरचना पर चोट पर चोट होती गई. हिंदू-मुस्लिम पसंदीदा शादियों को लव जिहाद के नाम पर बदनाम करने, मुजफ्फरनगर के दंगे और उसके प्रभावों ने कामगार वर्ग, किसानों के बीच भी खाई पैदा की. गौ रक्षा के नाम पर सड़कों पर भूखी-प्यासी, कूड़ा और पोलिथिन थैलियां खाती गाय इन ठेकेदारों को नहीं दिखतीं. पर मौके की तलाश में ऐसे लोग दादरी, ऊना और अलवर में गौ रक्षा के नाम पर तनाव पैदा करने और मारकाट फैलाने में सबसे आगे रहते हैं. ताज्जुब तब होता है जब घटनाएं घटित हो जाने पर बीजेपी सरकार और उसके सरमायेदार धीरे से कोई ‘स्टेटमेंट’ या जांच का आदेश जारी कर देते हैं.

इनके विचारों से अलग मत रखने वालों को आए दिन राष्ट्र विरोधी होने का आरोप झेलना पड़ता है. उसमें भी दलित वर्ण, पिछड़े समुदाय, अल्पसंख्यक यानि मुसलमान, इसाई को अपनी बात कहने या संगठित प्रतिरोध में बहुत संभलकर चलना पड़ रहा है. पुरस्कार वापसी करने वालों पर कितने तरह के आरोप लगे. उसमें भी तोड़ने की संस्कृति कारगर हुई. जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में तोड़क शक्तियों ने छात्रों और शिक्षकों की एकजुटता और उनके संघों को राष्ट्रीयता और राष्ट्रीयता विरोधी समूहों में विभाजित करने की कोशिश की. रोहित वेमुला जैसे आंध्र के दलित छात्र नेता को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा. यहां तक कि उसकी मां को भी चरित्रहीनता का लांछन झेलना पड़ा. 

सवण् र्शी व्यवस्था का पोषक ये संघ परिवार/बीजेपी दलितों की संगठित शक्ति को तोड़ने, उन्हें उकसाने और दमित करने का कोई मौका नहीं चूकते- बलात्कार और शारीरिक हिंसा की सबसे अधिक शिकार दलित महिलाएं होती हैं.

तोड़ ने की यह संस्कृति है बहुत घातक- भारत जैसे बहुरंगी, सहिष्णु, उदार देश में सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे भाजपा नेता लेनिन को विदेशी आतंकवादी बताते हैं- तमिलनाडु के वरिष्ठ बीजेपी नेता एच राजा ने लोकप्रिय समाज सुधारक ई-वी- रामासामी ‘पेरियार’ के बारे में कहा कि पेरियार का भी हश्र लेनिन जैसा होगा- इस पर बीजेपी की कटु आलोचना हुई- नतीजतन एच राजा को तमिलनाडु की गर्म हवा देखकर माफी मांगनी पड़ी और फेसबुक से वह ‘पोस्ट’ हटाना पड़ा- इस तरह का दुस्साहस बीजेपी के लोग करते रहते हैं और शोरशराबा होने पर अपने वक्तव्य वापिस लेते हैं-

यह सिलसिला देश को कहां ले जाएगा? देश की जनता आज नहीं तो कल चेतेगी और इन्हें सबक सिखाएगी.

- भारती एस. कुमार

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