33 प्रतिशत आरक्षण बिल पास करो ! - एपवा


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस शताब्दी

यूपीए सरकार 33 प्रतिशत आरक्षण बिल को तत्काल पारित करे !

यौन उत्पीड़न व यौन हिंसा के विरुद्ध कानून बनाने में देरी क्यों? यौन उत्पीड़न के खिलाफ प्रस्तावित विधेयक से घरेलू कामगार महिलाओं को क्यों बाहर रखा गया है? और, इस विधेयक में ‘झूठी शिकायतों’ पर सजा जैसे महिला विरोधी प्रावधन क्यों हैं? बजट में कारपोरेट घरानों के लिए अरबों रुपयों की छूट लेकिन महिलाओं के पोषण और मातृ-स्वास्थ्य के लिए सरकार के पास पैसे की कमी क्यों?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिल्ली में संसद मार्ग पर मजदूर महिलाओं और  छात्राओं समेत विभिन्न पेशों से जुड़ी महिलाओं ने प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया। रंगीन बैनरों और नारे लिखी तख्तियों से सजे इस मार्च में महिलाओं ने गैर-बराबरी, उनके ऊपर होने वाली हिंसा और दमन के विरोध में नारे लगा कर अपने संघर्षों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया और अंतर्राष्ट्रीय महिला मुक्ति आंदोलन से अपनी एकजुटता जाहिर की। महिलाओं ने इस बात को याद किया कि अब से 100 साल पहले दुनिया के कई देशों की महिला मजदूरों ने कार्यस्थल पर अपने हकों, बराबरी और मताधिकार की मांग करते हुए क्रांतिकारी वाम संगठनों के बैनर तले 1911 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरूआत की थी।

पीलीभीत में महिलाओं को 8 मार्च मनाने पर पुलिस ने यह कहकर गिरफ्तार किया की यहाँ महिला दिवस मनाना मना है! 14 महिलाओं को गिरफ्तार किये जाने के बाद बताया गया की 15.15000 रु का ज़मानतदार न होने पर उन्हें जेल भेज दिया जायेगा. देवरिया में भी इसी तरह महिला दिवस मानाने वाली महिलाओं को गिरफ्तार किया गया. महिला मुख्यमंत्री के राज में जहाँ हर दिन महिलाओं पर हिंसा के वारदात होते हैं, महिलाओं को महिला दिवस मनाने के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है! भारत में आज भी कामगार महिलाओं को कार्यस्थल पर भेदभाव, शोषण और असुरक्षा के बीच रहना पड़ रहा है। सरकार खुद ही महिला कामगारों का शोषण कर रही है, और दुगना काम तक करवाया जाता है। घरेलू कामगारों का काम के वक्त मूलभूत मानवाधिकारों से भी वंचित रखा जाता है - यहां तक कि घरों व कालोनियों में काम के वक्त वे आवश्यकता होने पर शौचालय भी नहीं जा सकतीं। प्रायः ही उनके साथ क्रूरता, गाली-गलौज और यौन उत्पीड़न की घटनायें होती रहती हैं, फिर भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंध्ति विधेयक से परिवार की मर्यादा बचाने के लिए उन्हें बाहर रखा गया है। किसी अमीर व्यक्ति का घर एक गरीब महिला का कार्यस्थल होता है।

‘8 प्रतिशत विकास दर’ के तमाम दावों के बावजूद यह बड़े शर्म की बात है कि प्रसव के समय मौत की सर्वाधिक दर वाले पांच देशों में एक भारत भी है, और इसी देश में आधी से अधिक युवितयां कुपोषण की शिकार हैं और हजारों महिलाओं की मौत एनीमिया से हो जाती है। यूपीए सरकार के बजट में, जिसमें  कारपोरेट घरानों के लिए 5 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिये गये, दावा किया गया है कि महिलाओं के आहार और स्वास्थ्य के लिए बनी आईसीडीएस योजना का कवरेज बढ़ाने के लिए उसके पास धन ही नहीं है! इस कार्यक्रम के तहत केवल आंगनबाड़ी मजदूरों की मजदूरी रु. 3000 की गयी है लेकिन वह अब भी न्यूनतम मजदूरी की दर से काफी कम है।

आखिर क्यों सरकार 33 प्रतिशत आरक्षण बिल पारित करने और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न व यौन हमलों के खिलापफ कानून बनाने से पीछे हट रही है? यौन उत्पीड़न विरोधी विधेयक में ‘झूठी शिकायत’ की धरा क्यों जोड़ी गयी है? देश में सभी हिस्सों में अपना जीवन साथी चुनने के ‘अपराध’ में महिलाओं की हत्यायें हो रही हैं पिफर भी सरकार इज्जत के नाम में हो रहे अपराधों के लिए अलग से कानून बनाने से क्यों मना कर रही है? क्यों कश्मीर, उत्तर-पूर्व, ओडिशा, छत्तीसगढ़, लालगढ़ समेत देश के तमाम हिस्सों में महिलायें सुरक्षा बलों द्वारा बलात्कार और राज्य दमन का शिकार होती हैं? 

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