अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के जश्न का दिन है


- कविता कृष्णन

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है और पहले से ही मेरे पास इस तरह के मैसेज आ रहे हैं कि कैसे महिलाएं बगैर शिकायत किए पुरुषों की सेवा कर रही हैं (अपना नाम बदलने, घर बदलने, अपना परिवार छोड़ने, खाना पकाने, सफाई करने, ससुराल वालों की सेवा करने, पुरुषों की वंशावली को आगे बढ़ाने, बच्चों का पालन-पोषण करने आदि रूपों में)। हर साल की तरह इसने मुझे खिन्न कर दिया कि इतने सारे लोग एक दूसरे को फूहड़ किस्म के संदेश भेजकर पितृसत्ता की बेडि़यों के महिमामंडन और जश्न के जरिये अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (जो समाजवादी और नारीवादी मुक्ति के लिए संघर्षरत महिलाओं के नेतृत्व में पितृसत्ता और पूंजीवाद के खिलाफ एक शताब्दी पहले शुरू हुआ था) मना रहे हैं। बगैर शिकायत किए चुपचाप पुरुषों की सेवा करने, पितृसत्ता के नियमों को स्वीकार करने, घर की जिम्मेदारियों के बोझ को निभाने के लिए महिलाओं को महान कहना ठीक उसी तरह की बात है जैसे बगैर किसी शिकायत के मैला उठाने वाले किसी दलित की तारीफ करना: ये उत्पीड़न
का महिमामंडन है और एक तरह का झूठ भी है। अगर आप सचमुच में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कोई संदेश भेजना चाहते हैं तो पितृसत्ता को चुनौती दे रही महिलाओं को समर्थन देने वाले संदेश भेजिए। पुरुषों को संदेश भेजिए कि वे घर के कामों में बराबर के हिस्से की जिम्मेदारी निभाएं।

- राधिका मेनन
महिलाओं को जन्मजात मां, बहन, बेटी और बहू जैसी सेविका के तौर पर देखने की सोच को खत्म करने का संकल्प लें। सरकार के उन विज्ञापनों पर नाराजगी जाहिर करें जिसमें कहा गया है कि बेटियों को जन्मने दें वरना कहां से आपको पत्नियां और बहुएं मिलेंगी (बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से पाओगे?)। क्योंकि ये विज्ञापन केवल इस बात का सुझाव देते हैं कि पितृसत्ता परिवारों और पुरुषों के जीवन में (जो बहू से उनके वंश को चलाने और खाना पकाने, सफाई करने आदि की ही आशा करते हैं) कुछ निश्चित कामों को करने के लिए ही महिलाओं को पैदा होने का अधिकार है। इस बात की घोषणा करिए कि आप के परिवार की कोई महिला कब और किसके साथ बाहर आएगी-जाएगी इस पर कभी कोई रोक नहीं लगाएंगे। घोषणा करिए कि महिलाओं को शादी या फिर रिश्ते में अपने सहयात्री को चुनने में पूरी मदद करेंगे। अगर आप एक महिला हैं- तो इस बात की शपथ लीजिए कि अपनी मौजूदगी में किसी भी महिला को दुश्चरित्र कह कर अपमानित किए जाने का मौन समर्थन नहीं करेंगी। हम संकल्प लें कि पितृसत्ता को हम इजाजत नहीं देंगे कि वह महिलाओं को ‘अच्छी और बुरी’ - सीता और शूर्पनखा - में बांटकर उनकी एकता और एकजुटता को तोड़ें. 

और कृपया इस तरह से सोचना बंद कर दीजिए कि कुछ बलात्कारियों को फांसी की सजा दिलाने वाले कानून बलात्कार को रोकेंगे, जबकि ज्यादातर मामलों में तो बलात्कारियों पर कार्रवाई ही नहीं होती, सजा होना दूर की बात - और ज्यादातर यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामलों में महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। जब हमारे कोर्ट ये कहेंगे कि कानून और संविधान भाड़ में जाएं लेकिन पितृसत्ता के विशेषाधिकार की किसी भी हालत में रक्षा की जानी चाहिए: इसलिए पिता के ‘ना’ को लागू करने के लिए हदिया की ‘हां’ को किसी भी तरीके से दबाना है। जबकि फारूकी केस में सर्वाइवर को बताया जाएगा कि ‘माफ करिएगा, हम जानते थे कि आरोपी ने आपके हाथ को पकड़कर  नीचे दबाया और यहां तक कि लगातार आपके न करने के बावजूद जबरन सेक्स किया - लेकिन एक उस पुरुष के लिए ना बेहद ‘कमजोर’ है जिसके साथ आपने मिलकर शराब पी हो और कई सप्ताह पहले एक बार चूमा हो।

- राधिका मेनन 
बलात्कार कानून की धज्जियां उड़ाकर हमारा सुप्रीम कोर्ट महिलाओं से कह रहा है कि महिलाओं की न केवल ना कहने की जिम्मेदारी है बल्कि इस बात को सुनिश्चित करने की भी है कि पुरुष उसके ना को समझे। 498ए को कमजोर करने की सुप्रीम कोर्ट की घोषणा के साथ, कमजोर ना के फैसले और कानूनों के बेजा इस्तेमाल का पूरा एक शोरगुल भीषण संस्थागत प्रतिक्रिया का ही हिस्सा है। ऐसा लगता है कि हमारे कानून बनाने वाले लोग, हमारे कोर्ट सोचते हैं कि महिलाओं को 2012-13 के बलात्कार विरोधी प्रदर्शनों के बाद बहुत ज्यादा कुछ मिल गया और अब उन्हें उनकी सही जगह दिखाने की जरूरत है।

निश्चित तौर पर प्रतिक्रियावादी ताकतों में सबसे संगठित ताकत के तौर पर संघ परिवार और उसके आनुषंगिक संगठन हैं - जो फासीवादी प्रोपेगंडा टीवी चैनलों की मदद से मुस्लिम पुरुषों द्वारा हिंदू महिलाओं से शादियों को ‘लव जिहाद’ करार देकर महिलाओं की स्वायत्तता के खिलाफ लोगों को भड़का रहे हैं। ‘लव जिहाद’ से महिलाओं को बचाने के बहाने ऑनर क्राइम को राजनीतिक संस्तुति मिल जा रही है और इस तरह के रिश्तों में गयी महिलाएं और पुरुष भीषण हिंसा का शिकार बन जा रहे हैं। हदिया और शालू को इस बात के लिए सलाम किया जाना चाहिए क्योंकि वो दबाव का पूरी ताकत के साथ प्रतिरोध कर रही हैं- हादिया और शालू तो लड़ रही हैं पर उन जैसी कई और महिलाएं हैं जिन्हें संघ परिवार के लोग प्रताडि़त करके और यहां तक कि गुप्त क्लिनिक में ड्रग्स के द्वारा ब्रेनवाश करके जबरन अपने पति या जीवन साथी से अलग कर रहे हैं। कोबरापोस्ट के ‘आपरेशन जूलियट’ स्टिंग ने इस बात को साबित किया- लेकिन मीडिया और कोर्ट महिलाओं पर इस तरह के आतंक और अत्याचार पर मौन हैं।

लेकिन संघ इसको करने की ताकत हमारे समाज के सबसे घृणित पक्ष से ही हासिल करता है। हाल के एक नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक 15-49 साल की केवल 41 फीसदी महिलाओं को अकेले बाजार, स्वास्थ्य केंद्र और समुदाय से बाहर जाने की इजाजत है। इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे के एक और अध्ययन में पाया गया कि यहां तक कि पढ़ी-लिखी और रोजगारपेशागत महिलाओं को भी बाहर जाने से पहले अपने पति या फिर ससुराल वालों से इजाजत लेनी पड़ती है। एक दूसरे सोशल एट्टिट्यूड रिसर्च, इंडिया (एसएआरआई) के सर्वे ने पाया कि भारत की 50 फीसदी बालिग लोग महिलाओं के कामकाजी होने पर एतराज जाहिर करते हैं। और बहुत बड़ी तादाद में लोग (40 फीसदी दिल्ली और 60 फीसदी राजस्थान में) दलितों और गैर दलितों के बीच अंतर्रजातीय शादी का विरोध करते हैं। और अब राम माधव जैसे बीजेपी के नेता ऐसी सोच को ही भारत की आत्मा के तौर पर पेश कर इसका महिमामंडन करते हैं। और हम जैसे लोग जो इस पूरी सोच को बदलना चाहते हैं उनकी दूसरे ग्रह के वासी या फिर पाश्चात्य सभ्यता के पोषक के तौर पर ब्रांडिंग करते हैं।

क्या सेकुलर, कामगार, किसान, दलित आंदोलन सभी इस बात की घोषणा करेंगे कि वे बगैर किसी शर्त के महिलाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्तता की रक्षा करेंगे - परिवार से लेकर फैक्टरी और खेत-खलिहान सभी जगहों 
पर? मैं ऐसी आशा करती हूं। मैं यह जानती हूं कि आज महिला दिवस के अवसर पर बंगलुरू की सफाई कर्मी मजदूरों ने अपने परिवार सहित संकल्प लिया है कि वे महिला को कपड़ों और चरित्र आदि के आधार पर लज्जित-अपमानित करने का और सांप्रदायिकता और जातीय उत्पीड़न का पुरजोर विरोध करेंगे।

महिला छात्रों, महिला एक्टिविस्टों, फासीवाद के सामने सच बोलने वाली महिलाओं को बलात्कार और गौरी की तरह गोली मार देने की धमकियां मिल रही हैं। पिछले महिला दिवस के मौके पर गौरी हम लोगों के साथ थीं - इस साल हमने उन्हें फासीवादी गोलियों के सामने खो दिया। और उसके बाद भी अभी तक गोदी मीडिया के किसी इंटरव्यू लेने वाले ने प्रधानमंत्री से यह नहीं पूछा कि उन्होंने 2013 में सनातन संस्था को बधाई संदेश क्यों भेजा था - यह वही संस्था है जिससे गौरी की हत्या के मामले में गिरफ्तार एक आरोपी का संबंध था। वे प्रधानमंत्री से यह नहीं पूछ रहे हैं कि वे ट्विटर पर उन लोगों को क्यों फालो कर रहे हैं जिन्होंने गौरी की हत्या का जश्न मनाया था और हम जैसी महिलाओं को उसी तरह के हस्र की धमकी दी थी. 

लेकिन अंधकार के इन समयों में भी हमेशा की तरह लड़ने वाली महिलाओं - ‘बेशरम’ महिलाएं जिन्होंने शर्म को त्याग कर आक्रोश और सामूहिक एकता और प्रतिरोध को धारण कर लिया है - से आशा की किरण मौजूद है। बीएचयू की नौजवान महिलाएं, बंगलुरू की कपड़ा वर्कर, मुन्नार की टी गार्डेन वर्कर, बंगलुरू की सैनिटेशन वर्कर, अपनी पहचान और सम्मानजनक जीवन के लिए लड़ने वाले एलजीबीटी समुदाय के लोग, जहां और जब मर्जी बिंदास घूमने की आजादी के लिए, प्रेम करने की आजादी के लिए, आरएसएस मुख्यालयों पर किस ऑफ लव (प्यार का चुम्बन) बांटने वाली, भरपूर तरीके से जीवन जीने वाली, लड़ने वाली जवान और बूढ़ी महिलाएं और इसके साथ ही ऐसे पिता, भाई और माताएं जो अपने जीवन में महिलाओं की स्वतंत्रता को बगैर किसी शर्त के समर्थन देते हैं और ऐसी आजादी में खुशी हासिल करते हैं.

- आप सभी को मेरा बहुत सारा प्यार- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष के जश्न को मनाने का दिन है

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