घरेलू गुलामी के खिलाफ - लेनिन

औरतों की ही स्थिति को लीजिए. दुनिया की एक भी जनवादी पार्टी ने, सर्वाधिक उन्नत पूंजीवादी जनतंत्र में भी, दसियों साल में उसका सौवां भाग भी नहीं किया है, जो हमने अपनी सत्ता के बिलकुल पहले ही साल में कर दिया. जिन घृणित कानूनों ने औरतों को असमानता की स्थिति में डाल रखा था, या जिन्होंने तलाक पर पाबंदी लगा रखी थी और उसे वीभत्स औपचारिकताओं से घेर रखा था, अथवा जो अवैध बच्चों को मान्यता नहीं देते थे और उनके पिताओं की खोज की मजबूरी लागू करते थे, इत्यादि; वे कानून जिनके अनेक अवशेष, कहना चाहिए कि पूंजीपति वर्ग और पूंजीवाद के लिए लानत के बतौर, सभी सभ्य देशों में पाए जाते हैं - उन कानूनों को हमने रत्तीभर भी बाकी नहीं रहने दिया- इस क्षेत्र में जो कुछ हमने किया है उस पर गर्व करने का हमें हजार बार हक है. लेकिन हमने जितनी अधिक पूर्णता के साथ पुराने, पूंजीवादी कानूनों और संस्थाओं के कबाड़खाने की जमीन साफ की है, उतना ही अधिक हमारे लिए यह बात स्पष्ट है कि हमने अभी निर्माण के लिए महज जमीन साफ की है, लेकिन अभी निर्माण शुरू नहीं किया है.

औरत को आजाद करनेवाले सभी कानूनों के बावजूद, वह अभी घरेलू गुलाम बनी हुई है, क्योंकि हीन घरेलू काम उसे कुचलता है, उसका दम घोंटता है, उसे बुद्धिहीन बनाता है, जलील करता है, रसोईदारी और धायगीरी में बांध रखता है और उसके श्रम को बर्बरतापूर्वक अनुत्पादक, तुच्छ, कमरतोड़, बुद्धिहारी तथा पीस देनेवाली मशक्कत में बर्बाद करता है. औरतों की सच्ची मुक्ति सच्चे कम्युनिज्म का सूत्रपात केवल उसी जगह और उसी समय होगा, जहां और जब इस हीन घरेलू काम के खिलाफ (राज्य-सत्ता का उपयोग करने वाले सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में) एक जन संघर्ष शुरू होगा, अथवा यों कहें कि जब उस अर्थव्यवस्था का बड़े पैमाने की सामाजिक अर्थव्यवस्था में संपूर्ण रूपांतरण शुरू होगा.

क्या हम व्यवहार में इस प्रश्न पर काफी ध्यान देते हैं, जो हर कम्युनिस्ट के लिए निर्विवाद है ? बेशक, नहीं. क्या हम कम्युनिज्म के उन अंकुरों के बारे में पर्याप्त रूप से फिकरमंद हैं, जो इस क्षेत्र में पनप चुके हैं ? हमें जोर देकर फिर कहना होगा - नहीं. सार्वजनिक भोजनालय, शिशु-शालाएं किंडरगार्टन - ये हैं उक्त अंकुरों के नमूने, ये हैं वे सीधे-सादे रोजमर्रा के साधन जिनमें कुछ भी शानदार, ठाटदार या समारोहपूर्ण नहीं है, लेकिन जो औरतों को वस्तुतः आजाद कर सकते हैं, जो वस्तुतः सामाजिक उत्पादन और सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका के लिहाज से मर्दों के साथ उनकी नाबराबरी को कम और उसका अंत कर सकते हैं. ये साधन नए नहीं हैं, वे (समाजवाद के सभी भौतिक पूर्वाधारों की तरह ही) बड़े पैमाने के पूंजीवाद द्वारा पैदा किए गए थे. लेकिन पूंजीवाद के अंतर्गत पहले तो वे विरले ही बने रहे और दूसरे, जो खास तौर से महत्वपूर्ण है, वे या तो सट्टेबाजी, मुनाफाखोरी, धोखेबाजी और जालसाजी के तमाम बुरे से बुरे लक्षणों के साथ नफा कमानेवाले उद्यम, अथवा "पूंजीवादी लोकहितैषिता की बाजीगरी" बने रहे, जिन्हें अच्छे से अच्छे मजदूर सही तौर पर हेय समझते थे, उनसे नफरत करते थे. 

बेशक, इन संस्थाओं की संख्या हमारे देश में बढ़ी है और उनका चरित्र बदलने लगा है. इसमें संदेह नहीं कि हम जितना जानते हैं, उससे कहीं अधिक संगठनात्मक प्रतिभा मजदूर-किसान औरतों में है; कि हम जितना समझते हैं उससे कहीं अधिक लोग ऐसे हैं जो बहुसंख्यक मजदूरों और उससे भी अधिक बहुसंख्यक उपभोक्ताओं की शिरकत के साथ योजनाओं, व्यवस्थाओं आदि के बारे में उन ढेर सारे जुमलों, हंगामों, टंटाबाजी और बकवास के बगैर व्यावहारिक कामों को संगठित कर सकते हैं, जिनसे हमारे मगरूर "बुद्धिजीवी" या अधकचरे "कम्युनिस्ट" ग्रस्त हैं. लेकिन हम नवीनता के इन अंकुरों का पोषण जैसा चाहिए, वैसा नहीं कर रहे हैं.

जरा पूंजीपति वर्ग को देखिए. अपनी जरूरतों का विज्ञापन करना वह कितनी अच्छी तरह जानता है. देखिए कि जिन्हें पूंजीपति "माडल" समझता है, उनके अखबारों की लाखों प्रतियों में किस तरह उनकी ढोल पीटी जाती है! देखिए कि किस प्रकार"माडल" पूंजीवादी संस्थाएं राष्ट्रीय गर्व की चीज बना दी जाती हैं! हमारे अखबार इस बात की तकलीफ नहीं गवारा करते या मुश्किल से ही करते हैं कि सबसे अच्छे भोजनालयों अथवा शिशु शालाओं का वर्णन करें, ताकि दिन-प्रतिदिन के आग्रह द्वारा उन्हें अपने ढंग का मॉडल बना दें. वे इन संस्थाओं का पर्याप्त प्रचार नहीं करते, वे इस बात का ब्योरेवार वर्णन नहीं करते कि आदर्श कम्युनिस्ट श्रम के द्वारा मानव-श्रम की कितनी बचत, उपभोक्ता के लिए कितनी सुविधाएं, उत्पादों की कैसी किफायत, घरेलू गुलामी से औरतों की कितनी मुक्ति, सफाई की अवस्थाओं में कितनी बेहतरी हासिल की जा सकती है और उन्हें सारे समाज में, सभी मेहनतकशों तक पहुंचाया जा सकता है.

- (लेनिन, एक महान आरंभ, 28 जून 1919)

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