महिला संबंधी कानूनों को जानें

कानून और अदालतें अक्सरहां स्वयं में बेहद महिला विरोधी हैं. पर बहुतेरे मौकों पर महिला आन्दोलन ने कानूनों में प्रगतिशील बदलाव करा पाने में सफलता हासिल की है और कानूनों पर दबाव बनाया कि वे महिला अधिकारों को प्रतिबिंबित करें. आइये खासतौर पर महिला संबंधी कानूनों के कुछ अधिक महत्वपूर्ण आयामों को जानें. 


मथुरा मामला : मथुरा महाराष्ट्र की एक किशोर आदिवासी लड़की थी. वो एक लड़के से प्यार करती थी इसलिए उसके घरवालों ने लड़के के खिलाफ अपहरण का केस दाखिल कर दिया था. इसी मामले के सिलसिले में वो थाने के अन्दर थी जबकि उसका परिवार बाहर उसका इंतजार कर रहा था. दो पुलिसवालों ने थाने के भीतर उसका बलात्कार किया. पुलिसवालों को निचली अदालत ने बरी कर दिया. पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस रिहाई को पलट दिया और पुलिसवालों को सजा सुनाई पर 1979 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जसवंत सिंह, कैलाशम और कौशल की बेंच ने इस मामले में (तुकाराम बनाम महाराष्ट्र सरकार) बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को यह कहते हुए पलट दिया कि मथुरा ने कोई विरोध नहीं किया था - उसके शरीर पर किसी किस्म के चोट के निशान नहीं दिख रहे थे - इससे उन्होंने माना कि चूंकि कोई विरोध नहीं हुआ था इसलिए यह बलात्कार नहीं था. फैसला में कहा गया कि ‘चूंकि उसे शारीरिक सम्बन्ध् बनाने की आदत थी तो हो सकता है कि उसने पुलिसवालों को संबंध बनाने के लिए उकसाया हो (उन्होंने ड्यूटी के दौरान शराब पी रखी थी).’

दिल्ली विश्वविद्यालय के कानून के प्रोफेसर उपेन्द्र बख्शी, रघुनाथ केलकर और लतिका सरकार, और पुणे की वसुध धगमवार ने इस फैसले का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट को खुली चिट्ठी लिखी - और इस चिट्ठी ने देश भर में बलात्कार कानूनों और बलात्कार के मामलों में सबूतों की कानूनी समझ में बदलाव की मांग के साथ महिला आन्दोलन की चिंगारी को भड़का दिया. इस खुली चिट्ठी में कहा गया था कि ‘क्या विवाह के पहले शारीरिक संबंध बनाने के खिलाफ हौव्वा इतना बड़ा है कि इससे भारतीय पुलिस को एक बच्ची के साथ बलात्कार करने का लाइसेंस मिल जाए?’ खुली चिट्ठी के बाद हुए विरोधों के कारण 1983 में बलात्कार और उससे संबंधित कानूनों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए. 

* 1983 के कानून में जेल के भीतर हुए बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की पहचान और व्याख्या हुई.
* 1983 के कानून में जेल के भीतर हुए बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के मामलों में बढ़ी हुई सजा का प्रावधान है.
* इसने 1860 की भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (2) के तहत दर्ज मामलों - मसलन हिरासत में बलात्कार (जेल के भीतर बलात्कार/पुलिस द्वारा किए गए बलात्कार) में सहमति न होने की अवधारणा को शामिल किया. उसी के अनुसार भारतीय प्रमाणन कानून- धारा 114 (I) IEA में एक संशोध्न भी किया गया. इसका अर्थ यह था कि पुलिस हिरासत (कस्टडी) में हुए बलात्कार के मामलों में यदि शारीरिक संबंध साबित हो गया हो और महिला बलात्कार का आरोप लगाती है, तो अदालत यहां उसकी असहमति को लेकर अवधारणा बनाएगी. इसे एक ‘खंडनीय धरणा’ कहा गया - ऐसी धारणा जिसे बचाव पक्ष चुनौती दे सकता हो या खारिज कर सकता हो.
* बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करने को भी अपराध माना गया - यदि यह पीड़िता की सहमति से ही न किया गया हो या, उसके करीबी रिश्तेदार द्वारा पीड़िता की मृत्यु/नाबालिग/मानसिक रूप से कमजोर होने की स्थिति में ही न किया गया हो. अदालत द्वारा तदनुसार कुछ निश्चित बलात्कार के मामलों में ‘बंद कमरे में मुकदमा’ का भी प्रावधान किया गया न कि खुली अदालत में मुकदमा जो आम तौर पर होता है जहां मीडिया और आम पब्लिक इत्यादि का आना वर्जित है.
* भारतीय प्रमाण कानून की धारा 53ए को भी शामिल किया गया जिसके तहत बलात्कार के मुकदमे के समय पीड़िता के पिछले शारीरिक संबंध या उसके ‘चरित्र’ संबंधी सुबूत पेश करना अदालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता था. 

2013 के बाद महिलाओं के खिलाफ हिंसा संबंधी कानूनों की स्थिति

जैसा कि आपको पता ही है कि 2012-13 के बलात्कार विरोधी संघर्षों के बाद आपराधिक कानून संशोधन 2013 (आ.का.सु. 2013) के रास्ते बलात्कार एवं यौन हिंसा संबंधी कानूनों में बदलाव शामिल हुए. आज की तारीख में इन कानूनों के कुछ खास बिंदु निम्न हैं :

1. भारतीय दंड संहिता की धारा 166 ए - पुलिस अधिकारी की जवाबदेही यदि कोई पुलिस अधिकारी या अन्य सरकारी कर्मचारी, अपने पास आई हुई शिकायत दर्ज नहीं करता है, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए, 326बी, 354, 354बी, 370, 370ए, 376, 376ए, 376बी, 376सी, 376डी, 376ई, 509 (महिलाओं के खिलाफ हिंसक अपराधों) के तहत उसे कम से कम 6 महीने का कठोर कारावास (और अधिक से अधिक 2 साल) और जुर्माने की भी सजा हो सकती है. 

आ.का.सं. 2013 स्पष्ट करता है कि यौन अपराध् के मामलों या 166ए या 166बी के तहत आरोपी सरकारी कर्मचारी या पुलिस कर्मी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के लिए 197(1) सीआरपीसी के तहत सरकार से पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं है. पर आ.का.सं.2013 ने ऐसा स्पष्टीकरण, 197(2) सीआरपीसी जिसमें सशस्त्र बल आते हैं के लिए नहीं दिया.

भारतीय दंड संहिता की धरा 166बी - एसिड हमले और बलात्कार की शिकार महिलाओं के लिए मुफ्त इलाज :  धारा 326ए, 376, 376ए, 376बी, 376सी, 376डी या भा.दं.सं की धारा 376 ई के तहत आने वाले किसी भी हमले की शिकार पीड़िता को सभी अस्पताल फिर वे चाहे सरकारी हों या निजी, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय संस्थाओं या फिर किसी व्यक्ति द्वारा संचालित सभी, सीआरपीसी की धारा 357 सी के तहत तत्काल मुफ्त प्राथमिक चिकित्सा या इलाज करेंगे और इस तरह की घटना की सूचना तत्काल पुलिस को देंगे. एसिड हमले या बलात्कार की शिकार को इस तरह का मुफ्त इलाज न उपलब्ध कराने या घटना की सूचना पुलिस को न देने वाले अस्पताल का प्रभारी व्यक्ति या स्थानीय संस्थाएं धारा 166बी के तहत सजा के भागी हो सकते हैं.

(ऐपवा और बहुत से महिला संगठनों ने इस धारा के इस पहलू का विरोध किया जिसके तहत अगर बलात्कार की शिकार इलाज के लिए आती है तो अस्पतालों और डॉक्टरों को पुलिस को सूचना देना अनिवार्य है- क्योंकि नतीजतन अगर कोई पीड़िता पुलिस के पास शिकायत दर्ज नहीं करना चाहती तो वह इलाज के लिए आने में भी भी कतराएगी.)

2. भा.दं.सं. की धरा 326 ए एवं बी - एसिड हमले: इन दो धाराओं के तहत एसिड हमले द्वारा चोट पहुंचाने या चोट पहुंचाने की कोशिश करने वाले को सजा का प्रावधान है. यह कानून ‘लिंग-निरपेक्ष’ है - यानि इस में आरोपी और पीड़ित दोनों ही किसी भी लिंग के हो सकते हैं. अन्य ज्यादातर धाराओं में पीड़ित सिर्फ महिला और आरोपी सिर्फ पुरुष ही हो सकते हैं.

एसिड का इस्तेमाल करके चोट पहुंचाने का अगर किसी को दोषी पाया गया तो उसे कम से कम 10 साल का कठोर कारावास या आजीवन कारावास की सजा हो सकती है.दोषी को जुर्माना (जो चोट के इलाज के लिए काफी हो) भी भरना पड़ेगा जो पीड़ित को दिया जायेगा.

एसिड फेंकने या एसिड फेंकने की कोशिश करने के दोषियों को 5 से 7 साल तक की सजा हो सकती है, और वे भी जुरमाना भरेंगे.

3. धारा 354 और 509: धारा 354 के तहत किसी महिला पर उनके मर्यादा को ठेस पहुंचाने की मंशा से हमला या आपराधिक बल प्रयोग की सजा कम से कम 1 साल और अधिकतम 5 साल है. धारा 509 के तहत अगर कोई पुरुष ‘किसी शब्द, आवाज या इशारे के जरिए या किसी वस्तु को दिखाकर महिला के मर्यादा को अपमानित’ करता है, तो उसे तीन साल तक साधारण कारावास की सजा हो सकती है.

4. धारा 354 ए - यौन उत्पीड़न : किसी पुरुष द्वारा महिला के खिलाफ निम्न कार्रवाइयों को यौन उत्पीड़न समझा
जाएगा : -
1. अनचाहा शारीरिक स्पर्श
2. अनचाहा यौन प्रस्ताव/मांग
3. किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध अश्लील साहित्य/फोटो/पोर्नोग्राफिक सामग्री दिखाना
4. यौन अर्थ वाले जुमले, संकेत, लतीफे आदि 
इसमें 1 से 3 तक के मामले संबंधी अपराधों के लिए तीन वर्ष तक का कठोर कारावास कैद और चौथे के लिए तीन साल तक का कारावास का प्रावधान किया गया है।

5. धारा 354 बी : निर्वस्त्र करने का प्रयास किसी भी महिला को जबरदस्ती कपड़े उतारने या निर्वस्त्र होने को बाध्य करने के जुर्म की सजा 3 से 7 वर्ष, जुर्माना सहित दी जा सकती है।

6. 354 सी : दर्शनरति (ताकझांक) ‘निजी’ गतिविधि करती हुई या कोई निजी यौन कार्य कर रही महिला को उसकी सहमति के बगैर घर, सार्वजनिक शौचालय, एकांत जगहों पर देखने, या कैमरे में फोटो खींचने पर, जहां उसे देखे जाने की उम्मीद न हो, के लिए जुर्माना सहित एक से तीन वर्ष सजा का प्रावधान है. अगर किसी पुरुष को इसी जुर्म के लिए दुबारा सजा होती है, तो उसकी सजा तीन से सात वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है।

नोट - तमाम यौन अपराधों की तरह इस अपराध में भी महिला की सहमति का उल्लंघन ही जुर्म है. अगर कोई महिला बिना कपड़े के या यौन कार्य के दौरान अपना फोटो या विडियो देने के लिए सहमति दे चुकी है, तब भी इस तरह की निजी गतिविधि के फोटो या चित्रों का उसकी सहमति के बिना वितरण भी अपराध की श्रेणी में आएगा.

7. एस. 354 डी : स्टॉकिंग किसी महिला का जबरन पीछा करना या उसे परेशान करने की कोशिश, खुलेआम, छिपकर या उसके फोन, इंटरनेट, ईमेल या अन्य संचार उपकरणों की ताका-झांकी को अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है. जुर्म की रोकथाम या कानूनी कार्रवाई अथवा किसी जायज कारण का उल्लेख किये बगैर इस तरह की कोई भी गतिविधि अपराध मानी जायगी. पहली बार अपराध साबित होने पर 3 साल की सजा होगी (और जुर्म को जमानती माना जाएगा) और अगर वही व्यक्ति दुबारा अपराध करता है तो 5 साल तक सजा होगी (इस बार जुर्म गैरजमानती होगा).

8. धरा 370 : तस्करी मानव तस्करी का यह कानून महिलाओं और बच्चों की तस्करी के मामलों में इस्तेमाल
होता है.

9. एस. 375 : बलात्कार संशोधित कानून में बलात्कार की परिभाषा को और व्यापक बनाया गया है.यानि पुरुष के गुप्तांग द्वारा महिला के गुप्तांग को भेदने के अलावा महिला के मुंह, योनि, गुदा या मूत्रामार्ग में कोई वस्तु या शरीर का अंग डालने या उसकी इजाजत के बिना जबरदस्ती उसे अपने या किसी अन्य के साथ ऐसा करने को मजबूर करने (अपना मुंह उसके मुंह, योनी, गुदा, मूत्रामार्ग पर लगाना या किसी अन्य के साथ लगाने को बाध्य करना) या उसके शरीर में कुछ जबरन घुसेड़ने या किसी अन्य के साथ ऐसी कोई हरकत करने या करवाने को बाध्य करने को बलात्कार माना जाएगा.
* इस संशोधित कानून में ‘सहमति’ की परिभाषा को और स्पष्ट किया गया है. सहमति का मतलब है - एक सुस्पष्ट व स्वैच्छिक सहमति, जहां महिला शब्दों, इशारों या किसी भी तरह के शाब्दिक या गैरशाब्दिक तरीके से कहती है कि वह एक विशेष यौन कार्य के लिए राजी है. कानून में बहुत साफ है कि नशे की हालत में, बेहोशी, दवा के असर या कोमा की हालत में, धमकी या डर की हालत में, महिला सहमति जाहिर नहीं कर सकती और इसलिए ऐसी हालत में किसी महिला के साथ यौन कार्य बलात्कार ही माना जाएगा. अगर महिला यह नहीं समझ
पाती कि वह किस बात की सहमति दे रही है (भाषा न आने पर, मानसिक कमजोरी, विकलांगता, अक्षमता या पागलपन में) तब भी बलात्कार माना जाएगा.
* सिर्फ इसलिए कि महिला ने यौन संबंध का शारीरिक विरोध नहीं किया अथवा ‘ना’ नहीं कहा, इसे यौन संबंध बनाने के लिए महिला की सहमति नहीं मानी जाएगी. सहमति तभी मानी जाएगी जब महिला ने सकरात्मक तरीके से और जानबूझकर ‘हां’ जताया हो. 

कानून के प्रोफेसर मृणाल सतीश लिखते हैं :-
* अगर महिला यौन संबंध के लिए सहमत हो जाती है, लेकिन यौन संबंध के दौरान सहमति वापस ले लेती है, और उसके बावजूद पुरुष यौन संबंध को नहीं रोकता है, तो उस यौन संबंध को उस पल से बलात्कार माना जाएगा, जिस पल से महिला ने अपनी सहमति वापस ली.
* लेकिन अगर महिला यौन संबंध के लिए सहमत हो जाती है, लेकिन यौन संबंध पूरे होने के बाद अपना मन बदलती है तो इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा बशर्ते कि यह साबित नहीं होता है कि महिला की सहमति धोखे से ली गयी.
* बलात्कार की सजा को कम से कम 7 साल तय कर दिया गया है. इससे पहले के कानून में यह प्रावधान था कि जज बलात्कार की सजा को कम कर सकते थे, इसके चलते अक्सर पितृसत्तात्मक मूल्यों के बहाने बलात्कार की सजा कम कर दी जाती थी. जैसे - अगर पीड़िता शादीशुदा हो, तो जज यह कहकर सजा कम करते थे कि बलात्कार से इस महिला की शादी तो नहीं रुक रही है. इस प्रावधान को हटा दिया गया है.

376 (2)- संगीन बलात्कार
संगीन बलात्कार की श्रेणी में हिरासत में बलात्कार यानि पुलिसकर्मी, सेनाकर्मी, संस्थानों (जेल, रिमांड होम आदि) के आधिकारिक पदाधिकारी, सरकारी कर्मचारी, अस्पताल के कर्मचारी, वर्दीधारी पुरुष द्वारा बलात्कार शामिल किये जाते हैं. किसी महिला के रिश्तेदार, अभिभावक, अध्यापक या ऐसा कोई भी व्यक्ति जो उस महिला का विश्वस्त हो या उसके ऊपर कोई प्राधिकार रखता हो, ऐसे सभी मामलों को संगीन बलात्कार की श्रेणी में जोड़ा गया है. निम्न परिस्थितियों को भी संगीन बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है -
1. साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान बलात्कार.
2. सहमति देने में असमर्थ महिला के साथ बलात्कार.
3. आधिकारिक पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा बलात्कार.
4. एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्कार.
5. बलात्कार जिसके परिणाम स्वरूप महिला शारीरिक रूप से विकलांग या मानसिक तौर पर असक्षम हो गई हो उसको गंभीर चोटें आई हों.
6. गर्भवती महिला के साथ बलात्कार.
7. सोलह वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ बलात्कार 

संगीन अपराध के मामलों में कम से कम दस साल की सजा होगी और आजीवन कारावास भी हो सकती है. धारा 376 (2) के तहत संगीन अपराधों के इन सभी मामलों में यदि शारीरिक संबंध साबित हो गया हो और महिला बलात्कार का आरोप लगाती है, तो अदालत यहां उसकी असहमति को लेकर अवधारणा बनाएगी. इसे एक ‘खंडनीय धारणा’ कहा गया - ऐसी धारणा जिसे बचाव पक्ष चुनौती दे सकता हो या खारिज कर सकता हो.

376 ए : मृत्यु या निष्क्रिय अवस्था में पहुंचाने के अपराध की सजा
इस खण्ड के अनुसार पीड़ित की मृत्यु हो जाने पर या उसे हमेशा के लिए निष्क्रिय अवस्था में पहुंचाने के अपराध के लिए कम से कम बीस वर्ष कठोर कारावास की सजा है और आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड भी दी जा सकती है.

376 बी: पति द्वारा पत्नी के साथ सेपरेशन के दौरान बिना पत्नी के सहमति के यौन संबंध को बलात्कार माना जाएगा और इसकी सजा दो से पांच वर्ष तक की है.

376 सी : हिरासत में यौन हिंसा आधिकारिक पद का दुरुपयोग कर महिला को यौन संबंध के लिए मजबूर करने, (ऐसा यौन संबंध जो बलात्कार जितना संगीन न हो और जिसमें ऐसे दर्शाया जाए जैसे सहमति के साथ बनाया रिश्ता हो) पर कम से कम पांच और अधिकतम दस वर्ष की सजा दी जा सकती है.

नोटः यहां महिला की सहमति के बावजूद हिरासत में बनाए गए यौन संबंध को जुर्म माना जा रहा है. हिरासत में सहमति के खिलाफ बनाए गए यौन संबंध को 376 (2) के तहत बलात्कार माना जाता है.

376 डी : सामूहिक बलात्कार
सामूहिक बलात्कार की सजा दस साल से बढ़ाकर बीस वर्ष कर दी गई है. इसमें आजीवन कारावास भी हो सकती है और इसमें दोषी को पीड़िता को इलाज और पुनर्वास के खर्चे के लायक मुआवजा देना होगा. 

नोटः ऐसिड हमले व बलात्कार आदि के मामलों में हमारी मांग है कि पुनर्वास और इलाज के खर्चे सरकार को तुरंत देना चाहिए, इसमें सजा होने का इंतजार नहीं होना चाहिए. अगर आरोपी दोषी सिद्ध होता है तो फिर सरकार आरोपी से मुआवजे की राशि को जुर्माने के बतौर वसूल कर ले.

376 ई : आदतन अपराधी की सजा
376, 376 ए, या 376 डी के तहत सजा काट चुके व्यक्ति को दोबारा अपराध करने पर उम्र कैद या मृत्युदण्ड की सजा का प्रावधान किया गया है. 

अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में संशोधन

भारतीय प्रमाण कानून की धारा 146 को संशोधित किया गया जिसके तहत बलात्कार के मुकदमे के दौरान पीड़िता से पूछताछ के समय उसके पिछले शारीरिक संबंध या उसके ‘चरित्र’ संबंधी सुबूत पेश करना अदालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता था.

1. एस. 54 : आरोपी की शिनाख्त अगर आरोपी की शिनाख्त करने वाला व्यक्ति मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम या विकलांग है तो यह प्रक्रिया- न्यायिक मजिस्ट्रेट की निगरानी में की जाएगी अथवा वीडियोग्राफी के ज़रिए की जाएगी।

2. एस. 154 : बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पीड़ित महिला का बयान धारा एस 376/354/509 या इससे जुड़ी धाराओं के तहत महिला पुलिस अफसर अथवा महिला अधिकारी द्वारा दर्ज किया जायेगा।

अगर पीड़िता अस्थाई या स्थाई तौर पर मानसिक रूप से विकलांग है तो बयान :-
(क) विडियोग्राफी के जरिए.
(ख) पीड़ित महिला के आराम का ध्यान रखते हुए.
(ग) एक विशिष्ट दुभाषिये या अनुवादक की मौजूदगी में दर्ज किया जाएगा।

3. एस. 309 : सुनवाई चार्जशीट दाखिल होने के दो माह के भीतर जहां तक संभव हो मामले की सुनवाई पूरी हो जानी चाहिए।

4. एस. 357 बी : पीड़िता को मुआवजा धारा एस 357 ए के अंतर्गत राज्य द्वारा दिये जाने वाले मुआवजे के अतिरिक्त आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 326 ए 376 डी के तहत मुआवजे की रकम अदा की जाएगी।


अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून

इस कानून की कई धाराएं महिलाओं के खिलाफ जुर्म से संबंधित हैं. इस कानून के सेक्शन 3 (w) (i) और (ii) के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का न हो, किसी अनुसचित जाति या जनजाति की महिला (यह जानते हुए कि वह अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की है) को यौनिक तरीके से छूता है या उसके प्रति यौनिक स्वभाव के शब्द, इशारे या कार्यों का प्रयोग करता है, उसे अत्याचार का दोषी माना जाएगा. इस कानून ने बलात्कार के संशोधित कानून में दिए गए सहमति की प्रगतिशील परिभाषा को अपनाया है. इसके अनुसार अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय की कोई महिला अगर यौन संबंध का शारीरिक विरोध नहीं करती है, सिर्फ इस बात से नहीं माना जाएगा कि उसने यौन संबंध के लिए सहमति दी है. इस कानून में यह भी स्पष्ट है कि किसी अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय की महिला के पिछले शारीरिक संबंध (यहां तक कि अगर उसका आरोपी के साथ भी पिछले शारीरिक संबंध रहे हों) से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाएगा कि वह सहमत थी और न ही अपराध को हल्का माना जाएगा.

इस कानून में अन्य कई किस्म के अत्याचारों की परिभाषा भी दी गयी है, जो अनुसूचित जाति या जनजाति के महिलाओं व पुरुषों के खिलाफ अक्सर होते हैं. जैसे चप्पलों का माला पहनाना, नंगे या अधनंगे तरीके से घुमाना, जबरदस्ती कपड़े उतारना, बाल या मूंछें छीलना, शरीर या चेहरे पर कालिख पोतना या किसी भी तरह का काम जो इंसान के सम्मान को ठेस पहुंचाता हो, को अत्याचार माना जाएगा. अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी व्यक्ति को डायन कहकर या जादू-टोना करने का आरोप लगाकर शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देना भी अत्याचार माना जाएगा.


2013 के संशोधित बलात्कार कानून में किन पहलूओं का हम विरोध करते हैं?

* इस कानून और पॉक्सो कानून 2012 ने सहमति की उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 कर दिया. ‘सहमति की उम्र’ वह उम्र है जिसके नीचे किसी व्यक्ति को बच्चा माना जाएगा और सहमति देने के काबिल नहीं माना जाएगा. यानि इस उम्र के नीचे किसी के साथ यौन संबंध् को हर हाल में बलात्कार माना जाएगा.

ऐपवा सहित कई महिला संगठनों ने और वर्मा कमिटी ने भी सहमति की उम्र को बढ़ाकर 18 करने का विरोध् किया था, क्योंकि इसके चलते 16 से 18 वर्ष के बीच के लड़कों को (खासकर वे जो उत्पीड़ित जातियों या अल्पसंख्यक समुदायों से हैं) अपने हमउम्र लड़कियों के साथ सहमति से संबंध बनाने पर भी बलात्कारी करार दिया जाएगा. हमने कहा कि इसकी बजाए इस उम्र के किशोरों को यौन संबंधों के प्रभाव व परिणाम के बारे में बातचीत करने और शिक्षित करने की जरूरत है, ताकि वे कम उम्र में ऐसे संबंधों से बचें.

* इस कानून में अब भी ‘मर्यादा उल्लंघन करना’ जैसे दकियानूसी और महिलाविरोधी शब्दावली का प्रयोग हुआ
है. वर्मा कमिटी ने सुझाव दिया था कि इस शब्दावली की जगह पर ‘यौन हिंसा’ शब्दों का इस्तेमाल हो.
* यह कानून शादी के भीतर बलात्कार को नहीं मानता है.
* बलात्कार के कुछ मामलों में मौत की सजा का प्रावधान किया गया है, हम मौत की सजा का विरोध करते हैं. 

हम चाहते थे कि इस कानून में पीड़ित की परिभाषा लिंग निरपेक्ष हो, यानि इस बात को माना जाए कि किसी भी लिंग के व्यक्ति का पुरुषों द्वारा बलात्कार हो सकता है. पर इस कानून ने पीड़ित की परिभाषा में सिर्फ महिलाओं को रखा. इस कानून में आफ्स्पा (AFSPA) और जनप्रतिनिधि् कानून में संशोधन नहीं किया जिसके तहत बलात्कार के आरोपी सैन्य कर्मियों और जन प्रतिनिधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए सरकार की स्वीकृति की जरूरत है. 

हमें यह भी समझना होगा कि बलात्कार का कानून कहां इस्तेमाल होना चाहिए और किन मामलों में उसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
1. बेटी के अपनी मर्जी से किसी पुरुष के साथ भागकर शादी करने के मामले में माता-पिता अक्सर अपहरण व बलात्कार के मुकदमे दर्ज करने की कोशिश करते हैं. ऐसे सभी मामलों में ऐपवा माता-पिता की इस कोशिश का साथ नहीं देती है बल्कि ऐसे हर मामले में हम उस जोड़ी की मदद करते हैं और बेटी को अपने माता-पिता द्वारा बनाए गए दबाव का सामना करने में साथ देते हैं.
2. क्या शादी का वादा करने के बाद शादी से इंकार करना बलात्कार माना जाता है? मृणाल सतीश लिखते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इस तरह के कई मामले अदालतों में आ रहे हैं. यह गलतपफहमी है कि 2013 वाले संशोधित कानून में ऐसे मामलों को बलात्कार माना गया है. यह सच नहीं है. अगर कोई पुरुष यौन संबंध के लिए किसी महिला की सहमति यह कहकर लेता है कि वह बाद में उससे शादी करेगा, पर बाद में शादी से मुकर जाता है, तो यह बलात्कार नहीं माना जाएगा. लेकिन अगर अदालत में यह साबित हुआ कि उस पुरुष का उस महिला से शादी करने का कभी इरादा नहीं था और धोखे से सहमति ली गयी तब बलात्कार माना जा सकता है. कानून में 2013 से पहले भी और बाद में भी इस बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं लिखा है, पर अदालतों में 2013 से पहले भी इस तरह की व्याख्या होती रही है.
अगर कोई पुरुष किसी महिला के साथ रिश्ते में रहने के बाद उससे शादी नहीं करता है, तो उस महिला को महसूस हो सकता है कि उसके साथ धोखा हुआ है. ऐपवा को ऐसी महिला की मदद करनी चाहिए ताकि वह इस बात को पहचाने कि कोई पुरुष द्वारा नकार दिए जाने पर उसका अपना महत्व या मान कम नहीं हो जाता बल्कि किसी पुरुष को इच्छा के विरूद्ध शादी के लिए मजबूर करने से दोनों ही लोग परेशान और दुखी रहेंगे. शादी करने के वादे को न निभाना बलात्कार नहीं है.

बलात्कार पीड़िता की मदद कैसे की जाए
* घटना के प्रति अविश्वास कभी मत जताइए.
* कभी पीड़िता से मत पूछिए कि ‘‘तुम चिल्लाई क्यों नहीं, भाग क्यों नहीं गई, तुमने शराब क्यों पी रखा था इत्यादि’’. संवेदनहीन या आलोचनात्मक टिप्पणियां न करें.
* पीड़िता को और उसके परिवार के सदस्यों को आश्वस्त करिए कि बलात्कार के लिए पीड़िता खुद किसी भी तरह जिम्मेदार नहीं है और न तो पीड़िता के किसी कृत्य की वजह से बलात्कार हुआ है और न ही पीड़िता कुछ ऐसा कर सकती थी, जिससे वह बलात्कार से बच जाए. बलात्कार की जिम्मेदारी पूरी तरह से बलात्कारी की है.
* पीड़िता को समझाइए कि बलात्कार एक जुर्म है, उसके खिलाफ की गई हिंसा है, न कि वासना की वजह से किया गया कृत्य है. 
* इस बात पर जोर दीजिए कि बलात्कार से पीड़िता की मान-मर्यादा, शुचिता इत्यादि का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, बल्कि उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है. बलात्कार की वजह से पीड़िता को नहीं, बल्कि बलात्कारी को शर्मिन्दा होना चाहिए.,
* पीड़िता को आश्वस्त करिए कि बलात्कार के बावजूद वह एक सुखी संपन्न जीवन जी पाएगी. पीड़िता को अपने अध्किरों के बारे में समझाइए और उसे खुद तय करने दीजिए कि वह क्या करना चाहती है. उसे आश्वस्त करिए कि वह जो भी निर्णय लेती है - यानि पुलिस के पास शिकायत दर्ज करने का निर्णय ले चाहे न ले - हम उसका साथ देंगे.
* अगर हो सके तो घटना के बाद पीड़िता को नहाने से बचना चाहिए जबतक कि मेडिकल जांच न हो जाए. घटना के समय पीड़िता द्वारा पहने हुए कपड़ों को बिना धोए रखे रहना चाहिए. 
* जहां पीड़िता बच्चा हो या किशोर हो, वहां उसके माता-पिता या अभिभावकों को दोष मत दीजिए, बल्कि उन्हें उत्साहित करिए कि वे पीड़िता को स्वीकृति और प्यार दे और बलात्कारी के अलावा किसी और को दोष न दें.

मेडिकल जांच के समय किन चीजों का ध्यान रखा जाए?

* अगर किसी बलात्कार पीड़िता महिला या लड़की की जांच पुरुष डॉक्टर करते हैं, तो उस समय किसी महिला  अटैन्डेंट की मौजूदगी अनिवार्य है.
* ट्रांसजेंडर/इंटरसेक्स (हिजड़ा, किन्नर इत्यादि) से जांच से पहले पूछा जाना चाहिए कि वे महिला अथवा पुरुष डॉक्टर में से किससे जांच करवाना चाहते हैं?
* मेडिकल जांच के दौरान पुलिसकर्मियों को मौजूद नहीं रहना चाहिए. अगर पीड़िता चाहती है तो उसके कोई रिश्तेदार साथ रह सकते हैं.
* मेडिकल जांच के लिए अस्पताल को एक अलग कमरा सिर्फ इस काम के लिए आवंटित करना चाहिए और जांच इसी कमरे में होना चाहिए.
* सेक्सुएल एसॉल्ट फॉरेन्सिक एविडेंस (सेफ) यानि यौन हिंसा की फॉरेंसिक जांच के लिए किट का मेडिकल जांच के दौरान प्रमाण इकट्ठा करने और दस्तावेजीकरण करने में इस्तेमाल होना चाहिए.
* कैजुअल्टी मेडिकल ऑफिसर को सभी केस के कागजात पर ‘मुफ्त’ वाली मुहर लगानी चाहिए, ताकि केस संबंधित सभी जांच और इलाज मुफ्त हो.
* मेडिको लीगल और इलाज संबंधित सभी दस्तावेजों की प्रति पीड़िता को मुफ्त में दिया जाना चाहिए.
* मेडिकल जांच के लिए पीड़िता की सहमति ली जानी होगी, उसे जांच करवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, पर जांच का तात्पर्य और उसकी जरूरत उसे समझाया जाना चाहिए और यह भी समझाना चाहिए कि वह जांच के लिए सहमति या इंकार जता सकती है.
* जांच में अगर चोट, वीर्य आदि के निशान न भी मिले, तब भी मेडिकल जांच की रिपोर्ट में डॉक्टर को उन कारणों का अनुमान लगाना होगा कि इन सबके बावजूद बलात्कार की संभावना को क्यों नकारा नहीं जा सकता?
* बलात्कार को स्थापित करने के लिए ‘‘टू फिंगर टेस्ट’’ नहीं होना चाहिए. मेडिकल रिपोर्ट को योनि या गुदा के नाप या योनि, गुदा या योनिच्छेद के लचीलापन के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. पीड़िता के पूर्व यौन संबंध या यौन संबंधों की आदत को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये सब यौन हिंसा के मामले में अप्रासंगिक हैं.
* यौन हिंसा के इतिहास का पूरे विस्तार से दस्तावेजीकरण होना चाहिए और इसके लिए बने प्रोफार्मा का इस्तेमाल होना चाहिए. पीड़िता से पूछकर इन सभी बातों को दर्ज किया जाना चाहिए - जैसे कंडोम का इस्तेमाल हुआ या नहीं हुआ, कौन से शरीर के अंग या वस्तुओं को शरीर में घुसाया गया, बाल खींचना, थप्पड़ मारना इत्यादि किस तरह की हिंसा की गयी.
* ‘‘बलात्कार या यौन हिंसा की घटना घटी है या नहीं, यह एक कानूनी सवाल है. यह मेडिकल मूल्यांकन का प्रश्न नहीं है. इसलिए मेडिकल जांच के आधार पर डॉक्टरों को ऐसा कोई निर्णय नहीं देना चाहिए कि बलात्कार या यौन हिंसा हुआ है कि नहीं. मेडिकल रिपोर्ट में सिर्फ मेडिकल जांच के नतीजे को दर्ज किया जाना चाहिए.’’

ये सभी बातें स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देश और प्रोटोकाल में दर्ज है. ये प्रगतिशील दिशा-निर्देश भी 2012 के बलात्कार विरोधी आंदोलन की उपलब्धियों में से है. इन्हें विस्तार से इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है. http://uphealth.up.nic.in/med-order-14-15/med2/sexualvil.pdf

लैंगिक अपराधें से बालकों को संरक्षण कानून 2012

इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को (सिर्फ पुरुष नहीं) बच्चों के खिलाफ लैंगिक अपराधों का दोषी पाया जा सकता है. इस कानून के तहत विभिन्न किस्म के बाल लैंगिक अपराधों को पारिभाषित किया गया है जैसे -

1. प्रवेशन लैंगिक हमला
क. अपना लिंग, किसी भी सीमा तक किसी बच्चे की योनि, मुंह, मूत्रमार्ग या गुदा में प्रवेश करना या बालक से उसके साथ या किसी अन्य बच्चे के साथ ऐसा करवाना.
ख. किसी वस्तु या शरीर के किसी ऐसे भाग को, जो लिंग नहीं है, किसी भी सीमा तक बच्चे की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा में घुसेड़ना या बच्चे से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाना.
ग. बच्चे के शरीर के किसी भी के साथ ऐसा अभिचालन करना जिससे वह बच्चे की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा या शरीर के किसी भी भाग में प्रवेश कर सके या बच्चे से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाना.
घ. बालक के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर अपना मुंह लगाना या ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति के साथ बालक से ऐसा करवाना.

2. संगीन प्रवेशन लैंगिक हमला
जब ऊपर वर्णित हमले पुलिस या सेनाकर्मी द्वारा, जेल या रिमांड होम, अस्पताल, शैक्षणिक या धर्मिक संस्था के स्टाफ या मैनेजमेंट के सदस्य द्वारा, बच्चे के रिश्तेदार द्वारा, 12 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ, या गैंग द्वारा, या घातक हथियार या ऐसिड का इस्तेमाल करते हुए, या जब हमले की वजह से शरीर या गुप्तांगों को गहरी चोट पहुंचे या हमले की वजह से प्रेग्नेंसी या एड्स का इन्फेक्शन या मानसिक बीमारी हो जाए, या जहां हमले के साथ हत्या की कोशिश हो या कपड़े उतारकर सबके सामने परेड कराया जाए, या आदतन अपराधी द्वारा किए जाएं, तो इन्हें संगीन प्रवेशन लैंगिक हमला माना जाएगा.

3. लैंगिक हमला
लैंगिक आशय से बच्चे की योनि, लिंग, गुदा या स्तनों को स्पर्श करना या बच्चे से ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति की योनि, लिंग, गुदा या स्तन का स्पर्श करवाना या लैंगिक आशय से ऐसा कोई अन्य कार्य करना जिसमें प्रवेशन किए बिना शारीरिक संपर्क किया जाता है, लैंगिक हमला माना जाएगा.

4. संगीन लैंगिक हमला
ऊपर वर्णित हमले पुलिस या सेनाकर्मी द्वारा, जेल या रिमांड होम, अस्पताल, शैक्षणिक या धर्मिक संस्था के स्टाफ या मैनेजमेंट के सदस्य द्वारा, बच्चे के रिश्तेदार द्वारा, 12 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ, या गैंग द्वारा, या घातक हथियार या ऐसिड का इस्तेमाल करते हुए, या जब हमले की वजह से शरीर या गुप्तांगों को गहरी चोट पहुंचे या हमले की वजह से प्रेग्नेंसी या एड्स का इन्फेक्शन या मानसिक बीमारी हो जाए, या जहां हमले के साथ हत्या की कोशिश हो या कपड़े उतारकर सबके सामने परेड कराया जाए, या आदतन अपराधी द्वारा किए जाएं, तो इन्हें संगीन लैंगिक हमला माना जाएगा. (आसाराम के खिलाफ इसी धारा के तहत केस है.)

यौन उत्पीड़न

पोर्नोग्राफी के लिए बच्चे का इस्तेमाल

पीड़ित बच्चे की मेडिकल जांच करवाने में मदद के लिए पुलिस को किसी अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता को बुलाना होगा. बच्चे का वक्तव्य घर में भी दर्ज किया जा सकता है. वक्तव्य दर्ज करने वाले पुलिस अफसर को यूनिफार्म नहीं पहनना चाहिए. मुकदमे के दौरान अदालत में बच्चे के सम्मान व सुरक्षा के बचाव के लिए विस्तृत प्रावधन किए गए हैं. इस कानून में यौन हिंसा की अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधन है यानि किसी भी व्यक्ति को बच्चे पर यौन हिंसा की जानकारी है, तो उसे पुलिस को बताना चाहिए, ऐसा नहीं करने पर उसे 6 माह की जेल की सजा या/और जुर्माना लग सकता है. 

महिला विरोधी घरेलू हिंसा सुरक्षा अधिनियम, 2005 

यह एक दीवानी कानून है. इसका मकसद घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को फौरी सहायता मुहैया कराना है. यह कानून ऐसे दूसरे आपराधिक कानूनों से अलग है जिनमें दोषियों को कैद या जुर्माने की सजा दी जाती है. यह कानून इस मान्यता पर आधारित है कि महिलाओं को भी एक हिंसामुक्त पारिवारिक जीवन का अधिकार मिलना चाहिए और यदि उनके इस अधिकार का हनन होता है तो वे निषेधज्ञा, मुआवज़ा तथा आर्थिक राहत जैसे कानूनी रास्ते अपना सकती हैं. इस कानून के तहत दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है.

धारा 3 (एफ): घरेलू संबंध की परिभाषा
एक ही मकान में साथ रहने वाले या किसी भी समय पर साथ रह चुके लोगों के संबंध घरेलू संबंध कहलाते हैं. साथ रहने वाले ये लोग रक्त संबंधें, विवाह या विवाह जैसी स्थिति, दत्तकता या संयुक्त परिवार के आधार पर एक-दूसरे से संबंधित हो सकते हैं. पत्नियों और पार्टनर्स के अलावा ऐसी महिलाएं भी इस कानून के तहत वैधानिक सुरक्षा की हकदार हैं जो बहन, विधव, मां या अकेली रहती हैं. 

धारा 3 : घरेलू हिंसा की परिभाषा
ऐसी हिंसा जिससे किसी औरत के स्वास्थ्य, सुरक्षा या कुशलक्षेम के लिए खतरा पैदा होता है. शारीरिक या यौन उत्पीड़न, मौखिक या भावनात्मक दुराचार या आर्थिक उत्पीड़न इस हिंसा के अंतर्गत आते हैं. दहेज या किसी अन्य संपत्ति के लिए गैरकानूनी रूप से मांग करना या दबाव डालना भी इस तरह की हिंसा के तहत आता है. 

व्याख्या 1 : हिंसा के स्वरूप
(क) किसी औरत को शारीरिक पीड़ा या नुकसान पहुंचाना, या उसके जीवन को खतरे में डालना या उसके स्वास्थ्य और उन्नति में रूकावट पैदा करना शारीरिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है. 
(ख) किसी महिला को अपमानित करने या उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए किया गया यौन आचरण, यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है.
(ग) यदि बेटा पैदा न करने के कारण किसी औरत को बेइज्जत किया जाता है, उसका मज़ाक उड़ाया जाता है या उसे अपमानित किया जाता है तो ऐसे व्यवहार को भावनात्मक या मौखिक उत्पीड़न माना जाएगा.
यदि औरत के किसी नजदीकी व्यक्ति या जिसमें महिला की दिलचस्पी हो, ऐसे व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुंचाने  की बार-बार धमकियां दी जाती हैं तो इसे भी भावनात्मक या मौखिक उत्पीड़न माना जाएगा.
(घ) साझा मकान में रहने वाली किसी महिला को आर्थिक या वित्तीय संसाधनों से वंचित कर देना आर्थिक उत्पीड़न कहलाता है. मिसाल के तौर पर, उसे जरूरी घरेलू चीजों, स्त्रीधन, संपत्ति और किराए के भुगतान आदि से वंचित किया जा सकता है. यदि संसाधनों और सुविधाओं तक निरंतर पहुंच में बाधा डाली जाती है या उसे रोक दिया जाता है तो यह भी आर्थिक उत्पीड़न कहलाएगा.

अदालत से राहत पाने के लिए औरत क्या कदम उठा सकती है :
धारा 4 : सुरक्षा अधिकारी या पुलिस को सूचित करना स्वयं पीड़ित महिला या उसकी ओर से कोई भी व्यक्ति घरेलू हिंसा के बारे में सुरक्षा अधिकारी (पीओ), सेवा प्रदाता (एसपी) या पुलिस को सूचित कर सकता/सकती है. यदि महिला खुद कानूनी कार्रवाई करना चाहती है तो इन सूचनाओं के आधार पर सीधे मजिस्ट्रेट के सामने अदालत में भी शिकायत दर्ज करा सकती है.

धारा 5, नियम 5, फॉर्म 1 : शिकायत दर्ज होने के बाद सुरक्षा अधिकारी या पुलिस की जिम्मेदारी
कोई भी महिला घरेलू हिंसा की स्थिति में सुरक्षा अधिकारी (पीओ), सेवा प्रदाता (एसपी), पुलिस या सीधे मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज करा सकती है. इस शिकायत को घरेलू घटना रिपोर्ट (डोमेस्टिक इंसीडेंट रिपोर्ट दायर) के रूप में (फॉर्म 1) दर्ज किया जाएगा. यह शिकायत दर्ज कराने के लिए डीआईआर ही आधिकारिक प्रारूप है.

यह फॉर्म-1 पुलिस थानों, सुरक्षा अधिकारियों या सेवा प्रदाताओं से प्राप्त किया जा सकता है. औरतें इसे खुद भर सकती हैं. अगर कोई औरत खुद इस फॉर्म को नहीं भर सकती तो पीओ, एसपी या पुलिस उसकी शिकायत को डीआइआर के रूप में इस फॉर्म-1 में तब्दील कर देंगे और शिकायत में जो कुछ लिखा होगा उसे महिला के सामने पढ़कर सुनाएंगे या समझाएंगे. इसके साथ ही उसे यह जानकारी भी दी जाएगी कि वह अदालत के माध्यम से राहत पाने के लिए अर्जी दे सकती है. 

अदालत द्वारा दिए जाने वाले आदेश और राहत :
धारा 18 : सुरक्षा आदेश
न्यायालय यह आदेश जारी कर सकता है कि -
(क) हिंसा करने वाले व्यक्ति को महिला के कार्य स्थल में दाखिल होने और उसे परेशान करने से रोका जाए. 
(ख) आरोपी को पीड़ित महिला के साथ पत्र व्यवहार, फोन, ई-मेल या व्यक्तिगत रूप से मिलकर किसी भी तरह का संचार करने से रोका जाए.
(ग) महिला से संबंधित किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी तरह की हिंसा रोकी जाए.

धारा 19 : आवास आदेश
यदि किसी महिला को उसके ससुराल के मकान से बाहर निकाल दिया गया है और वह वापस वहां लौटना चाहती है तो अदालत उसके पक्ष में आवास आदेश जारी कर सकती है. इस आदेश का मकसद यह है कि महिला को रहने की जगह मिले.

यदि महिला अपने साथ हिंसा करने वाले पुरुष/पुरुषों के साथ रहने में सुरक्षित महसूस नहीं करती है तो वह इस बात के लिए अर्जी दे सकती है कि ऐसे पुरुष/पुरुषों को साझा मकान से बाहर निकाला जाए. अदालत उनकी शिकायत के आधार पर आरोपियों को महिला के लिए किसी वैकल्पिक आवास की व्यवस्था करने का आदेश भी दे सकती है. 

धारा 20 : आर्थिक राहत
अपने साथ हुई हिंसा की वजह से महिला को जो नुकसान या खर्चा उठाना पड़ा उसकी भरपाई के लिए भी अदालत आदेश दे सकती है. इसके लिए अदालत उसके इलाज के खर्चे का भुगतान करने या उसके माल-असबाब को हुए नुकसान की भरपाई करने का आदेश दे सकती है. यदि महिला विवाहित है तो वह अपने पति/पुरुष पार्टनर से गुजारे भत्ते की भी मांग कर सकती है. 

धारा 21 : कस्टडी आदेश
अदालत पीड़ित महिला के बच्चों के बारे में वक्ती तौर पर कस्टडी का हुक्म दे सकती है. इस आदेश का मकसद ये सुनिश्चित करना होता है कि औरत को उसके बच्चों से अलग न किया जाए क्योंकि ऐसा करना अपने आप में एक तरह का भावनात्मक उत्पीड़न है.

धारा 22 : मुआवज़ा आदेश
अदालत पीड़ित महिला को पहुंचे शारीरिक और मानसिक आघात के लिए उसे मुआवजा भी दिला सकती है. यह मुआवजा वास्तविक व्यय के मद में दिलाई गई आर्थिक राहत के अलावा होगा.

[8-9 जुलाई, 2017 को समस्तीपुर, बिहार में आयोजित ऐपवा के क्षेत्रीय कार्यशाला में उपरोक्त पर्चा प्रस्तुत किया गया था. हिंदुत्व और महिला आजादी तथा महिला आंदोलन के बारे में मार्क्सवादी नजरिया शीर्षक से दो अन्य पर्चों पर भी इस कार्यशाला में चर्चा हुई थी, जिन्हें आगे के अंकों में प्रकाशित किया जाएगा.]

Comments

  1. M is atyachar se pidit hoo mujhe mere sasural se nikal Diya gya he or mujhe Marne ki dhmki dete hai plz help me

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  2. Itne date mahilaye k liye puruso k liye kya hai

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  4. Mre sasural wale mre pe jhute chori ke case banae h mujhe st sc hone pe gandi galiya dete h maine sasiralswalo pe dahej ka case lgaya h.sc st hone k nate mein aurakya kr sakti hu sukhati de

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