मेरी संघर्ष की साथी, कामरेड श्रीलता स्वामीनाथन की याद में



अनोखा व्यक्तित्व

कॉमरेड होने के साथ-साथ श्रीलता स्वामिनाथन मेरी एक अजीज दोस्त भी थीं।
उनके साथ ऐपवा के नेतृत्व में चले महिला आन्दोलनों में लगभग दस साल काम करने के अलावा मैं, साहित्य, कला, लोक-संगीत, पाक-शास्त्र, संस्कृति, यहाँ तक कि योग, आयुर्वेद और विपश्ना तक के बारे में बातें कर सकती थी. वे मद्रास के एक संभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखती थीं. दिल्ली में कामगार तबकों के लिए नाटक करते हुए उन लोगों के संपर्क में आने के रास्ते ही वो एम.एल.आन्दोलन में शामिल हुईं. श्रीलता तमिलनाडु के प्रसिद्द वकील और वहाँ के एडवोकेट जनरल एस.गोविन्दनाथन की बेटी और पूर्व वरिष्ठ संसद सदस्य अम्मू स्वामिनाथन की पोती थीं. सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित ऐतिहासिक आज़ाद हिन्द फ़ौज की कैप्टन लक्ष्मी सहगल की भांजी और बहुमुखी नृत्यांगना एवं नृत्य निर्देशक एवं दर्पण एकेडेमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स की संस्थापक मृणालिनी साराभाई इनकी एक और बुआ थीं. श्रीलता को अपनी इस परंपरा से बहुत सारी रचनात्मकता मिली और निश्चित रूप से इनकी राजनीतिक चेतना अप्रत्यक्ष रूप से ‘अमू दादी’ और ‘लक्ष्मी बुआ’ के माध्यम से ही आकार ली. मेरे देखे एम.एल. आन्दोलन में वे एक सर्वाधिक रोचक और जिंदादिल महिला थीं. वर्ग और जेंडर के परे आसानी से लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेना उनके व्यक्तित्व की खासियत थीं; वो एक साथ ग्रामीण उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की महिलाओं से बातें, उनके साथ हंसी-मजाक कर लेतीं थीं, दूसरी वाम धाराओं के नेताओं से बहस करतीं, चुनावों के दौरान राजस्थान के गाँवों की धूल-भरी सडकों पर जीप चला सकती थीं, गरीबों के साथ जमीन पर बैठ कर बाजरे की रोटी और तीखी मिर्च वाली चटनी खा सकती थीं, असम की महिलाओं के साथ बिहू में और झारखंड की महिलाओं के साथ लोक-नृत्य में शामिल हो जाती थीं. महिला, पुरुष और हर उम्र के लोग उनके बिंदासपने, खुशनुमा व्यवहार और मजाकिया अंदाज को पसंद करते थे. 


राष्ट्रीय नाट्य अकादमी में श्रीलता:

नाटक में रुचि और सलाहियत के नाते उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य अकादमी में दाखिला लिया होगा और 1968 में उन्हें वहां से स्नातक की उपाधि मिली. श्रीलता ने मुझे बताया था कि उन्होंने ओम पुरी और नसीरुद्दीन शाह जैसे काबिल अदाकारों को पढ़ाया है. मैंने देखा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सन्दर्भ में नसीर श्रीलता को याद करते हुए उनका नाम लेते हैं. नसीरुद्दीन अपनी किताब ‘And then One Day: A Memoir’ में स्वीकार करते हैं, “रा.ना.वि. के अंतिम नाटकों में से एक मरजीवा नाम का नाटक श्रीलता स्वामीनाथन के निर्देशन में हो रहा था. मुझे वो बिल्कुल पसंद नहीं आया था, पर हमें जो भूमिका दी गई हम उसे करने से मना भी नहीं कर सकते थे. जब नाटक पर काम शुरू हुआ तो श्रीलता ने कलाकारों को निर्देश देने के बजाय हम लोगों से कहा कि हम जैसे और जब चाहें तब शुरू करें. कलाकारों की मर्जी पर उनके इस विश्वास को मैंने उनकी लापरवाही माना और लगातार इस बात पर जोर देता रहा कि वे अदाकारी की आधारभूत योजना हमें मुहैया कराएँ; मैं बिना किसी के निर्देश के नाटक कर ही नहीं सकता था। मैं इतना बड़ा आलसी था कि खुद से कुछ करने की जहमत नहीं उठाता था. इसके अलावा मेरा स्वाभाविक अक्खडपना और घमंड इसमें सोने पर सुहागा था और असलियत यह थी कि मंच पर एक अभिनेता को क्या करना चाहिए इसकी मुझे कोई समझ नहीं थी पर फिर भी मेरे मिजाज देखकर हर किसी को यही लगता कि मैं सब जानता हूँ, इसी तरह का तकलीफ पहुंचाने वाला मिलजुमला इन्सान था. पर श्रीलता बिलकुल संत भाव से धैर्य के साथ यह कहती रहीं कि मैं जब और जहाँ चाहूँ खुशी से शुरू कर सकता हूँ और मैं लगातार इस पर अड़ा रहा कि आप बताएं कि मुझे कब और कहाँ से मूव करना है. स्थिति में एकदम गतिरोध सा आ गया और नाटक शुरू होने के करीब पंद्रह दिन पहले थक- हार के उन्होंने मेरे मूव पर काम शुरू कर दिया क्यूंकि मैं खुद से करने को तैयार नहीं था. उन सबमें मैंने जरा सा भी योगदान तो नहीं ही किया, उनका मुझमें जो वि विश्वास था उस पर अविश्वास जरूर किया और एक नए और अभिनय के प्रति सच में रोमांचक हो सकने वाले दृष्टिकोण की रास्ता दिखाने वाले मौके को बर्बाद कर दिया. अभी कुछ साल पहले ही मेरे दिमाग में यह ख्याल कौंधा कि श्रीलता क्या करना चाहती थीं पर तब मैं केवल अपनी मूर्खता के लिए उनसे माफी ही मांग सकता था.” 

श्रीलता के साथ रहने के दौरान मुझे पता चला कि राजस्थान में पार्टी के चुनाव अभियान के लिए नसीरुद्दीन आर्थिक सहयोग दिया करते थे. श्रीलता के साथ मैं रा.ना.वि. के एक समारोह में शामिल होने भी गई थी, उस समय देवेन्द्र राज अंकुर वहां के निदेशक थे. पहली बार मैंने इतने सारे रा.ना.वि. के पुराने छात्रों को उनसे इतनी इज्जत के साथ मिलते देखा. वहीं मुझे पता चला कि श्रीलता ने प्रसिद्द नाटककार इब्राहिम अल्काजी के साथ भी काम किया है. उनके साथ रानावि जाना और वहां की तमाम पुरानी चीजों को देखना एक रोमांचक अनुभव था. मुझे याद है जब हम एक मजदूर यूनियन की बैठक में शामिल होने अहमदाबाद गए थे, तो वहां मुझे दर्पण अकेडमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स जाने का भी मौका मिला. हमने वहां साथ में कठपुतलियों(छाया) का नाट्य मंचन देखा, मेरे लिए इस तरह का मंचन देखने का यह पहला मौका था. श्रीलता को 60 और 70 के दशक का विंटेज संगीत बहुत पसंद था. केन्द्रीय कमेटी की गंभीर बहसों के बीच चाय के अवकाश के दौरान वो जॉन डेनेवर, जिम रीव्स, निना सिमोन और एल्विस प्रेस्ली के गाये गाने गातीं. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का उनका गायन तो इतनी ऊर्जा और भावों से भरा होता कि कभी-कभी मैं अतीत के रूमान में पड़ जाती. न जाने कितनी ही बार वो जोनाथन स्विफ्ट, वाई बी यीट्स और शेली की कविताओं का ऐसे ही पर पाठ करने लगतीं. निश्चित रूप से वो एक जिज्ञासु पाठक थीं और दोस्तोवस्की और टॉलस्टॉय उनके पसंदीदा लेखक रहे. उनके साथ रहकर मैंने जाना कि संस्कृति के मोर्चों पर काम कर रहे अरुंधती नाग, गिरीश कर्नाड, सुहासिनी मुले, स्वर्गीय चंद्रलेखा (नर्तकी), ज़ोहरा सेगल, उषा उत्थुप और अंजली इला मेनन जैसे तमाम नामी लोग उनके दोस्त थे. हमारे बहुत से शौक मिलते जुलते थे; कला, साहित्य, संगीत, नृत्य और निश्चित रूप से अच्छा खाना; हम इससे जुड़े नोट्स आपस में लेते-देते और अक्सरहाँ जिन्दगी के हलके-फुल्के क्षणों को साझा करते. हमने अपने प्रदर्शनों के लिए मुखौटे बना कर, गीतों और नुक्कड़ नाटकों में भीड़ आकर्षित करने के अंदाज जैसे नए-नए तरीकों से लोगों को आन्दोलनों से जोड़ने की कोशिश की. यहाँ तक कि ‘होलिका दहन’ की जगह पर महिलाओं को तकलीफ देने वाली तमाम बुराइयों को प्रतीकात्मक रूप से जलाने जैसे तरीके भी अपनाए. 


मीडिया की दुनिया से श्रीलता का रफ्त-जब्त

श्रीलता ने ही मेरा 'इंडियन विमेंस प्रेस कोर’ में मेरा परिचय कराया और मैं आधी ज़मीन और लिबरेशन दोनों की संवाददाता के रूप में सदस्य बनी। बाद में हमने वहाँ खास तौर पर महिला आरक्षण बिल पर संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस व अन्य कुछ प्रेस-वार्तायें भी कीं। अगर प्रेस के साथ श्रीलता के संवाद की बात करें तो वो अक्सरहाँ निधड़क और मज़ाकिया होतीं; वो विनम्र भी रहतीं, पर अगर पत्रकार वामपंथी संगठनों के काम-काज को कम करके आँकता, जैसा कि दिल्ली में अक्सरहाँ होता रहा है, तो श्रीलता उन पर व्यंग कसने से न चूकतीं। मैं उन्हें माइक थमा देती और वह अच्छी हिन्दी में बोलने की पूरी कोशिश करतीं ताकि मीडियावाले, बात की नज़ाकत को समझ सकें। प्रेस-आमंत्रण से लेकर, पीछे लगने वाला बैनर, हिन्दी और अँग्रेजी में प्रेस विज्ञप्ति, चाय-पानी की व्यवस्था तक, एक-एक छोटी से छोटी बात का वो पूरा ध्यान रखतीं। वे ऑफिस पर निर्भर नहीं रहतीं, दिल्ली में उनके इतने सारे दोस्त थे कि हम किसी के भी घर या कंप्यूटर का इस्तेमाल कर लेते और साइबर कैफे से प्रिंटआउट निकलवा लिया करते थे। मैं उनकी हिन्दी टाइपिंग की कायल थी; उनकी हिन्दी टाइपिंग इतनी शुद्ध थी कि हमें अपनी प्रेस विज्ञप्तियां तैयार करने के लिए कभी किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ा; हम तो कार्यक्रम के बाद अखबारों के दफ्तरों में भी जाते और रिपोर्टिंग डेस्क पर खुद प्रेस विज्ञप्ति देते। इसी प्रक्रिया में बहुत सी महिला पत्रकारों से मेरा मेल-जोल हो गया था जो कि हमारे उद्देश्यों से काफी सहानुभूति भी रखती थीं; मृणाल पांडे, उषा राय, गार्गी परसाई उनमें से ऐसे ही कुछ लोग हैं। 


खुद करो!

श्रीलता के 'खुद करो' के सिद्धान्त से मैं इतनी प्रभावित थी कि मैं खुद हिन्दी टाइपिंग सीखने गई। और निश्चित रूप से आज तक मेरे लिए यह उपयोगी साबित हो रहा है। श्रीलता को उनकी महिला होने की हकीक़त ने कभी रुकने नहीं दिया। मुझे याद है कि एक बार हम दोनों राजस्थान के कुछ इलाकों में चुनाव प्रचार कर रहे थे। जिस जीप को श्रीलता चला रहीं थीं अचानक से वो पंक्चर हो गई। हम थोड़े निर्जन इलाके में थे वहां कोई पेट्रोल पंप या गैराज दिखाई नहीं पड़ रहा था। वो मोबाइल फोन का जमाना भी नहीं था तो मुझे चिंता होने लगी । श्रीलता नीचे उतरीं, एक जैक निकाला, टायर को ऊपर उठाने के लिए जैक चढ़ाया और नट खोलने लगीं ताकि टायर बदल सकें। उन्हें टायर घुमाते हुए सड़क के एक किनारे टिकाते देख मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हो रहा था। पता चला कि स्टेप्नी भी पंचर हो गई थी, कोई रास्ता नहीं था, फिर श्रीलता सड़क के बीचोंबीच खड़ी हो गईं और आते हुए एक ट्रक को हाथ हिलाकर रोकने लगीं। एक ट्रक ड्राइवर उन्हें मिल ही गया, उन्होंने टायर ट्रक में लादा और ड्राइवर के बगल यह कहते हुए धम्म से जाकर में बैठ गईं कि "किसी मैकेनिक के पास चलो, टायर ठीक करवाना है", उसे शायद मना करने की हिम्मत नहीं हुई! ठीक आधे घंटे के भीतर श्रीलता वापस आकर टायर लगा रही थीं। वे समय की बेहद पाबंद, काम-काज के मामले में पेशेवर और आत्मनिर्भर थीं। जिस काम को वो सीख सकतीं हैं उसके लिए कभी मदद नहीं मांगतीं। और उनका ये सबक तो मैं कभी भूल नहीं सकती: "अगर आप एक महिला संगठन चला रही हैं तो आपको सब कुछ खुद से करना आना चाहिए; पैसा कमाना भी! जहां आपने अपनी कोई कमजोरी दिखाई, लोग आप पर हावी हो जाते हैं"। अपनी जिंदगी के आख़िरी दिन तक उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। श्रीलता बच्चों से बहुत प्यार करती थीं और पार्टी परिवारों के बच्चों को उनके जन्मदिन पर बधाई देना या उनके लिए किताबें और चॉकलेट खरीदना कभी न भूलतीं। 


ग्रामीण राजस्थान,आई पी एफ और महिला आंदोलन में काम-काज

90 के दशक की शुरुआत में श्रीलता सीपीआई एमएल (लिबरेशन) के संपर्क में आईं और उन्होंने राजस्थान के झुंझनु जिले से आने वाले अपने पार्टनर कॉ. महेंद्र चौधरी के साथ राजस्थान में पार्टी ढांचे का निर्माण शुरू किया। उन्होंने मुझे बताया था कि उनका प्रेम-विवाह था और वे दोनों लोग पहले कानू सान्याल की भूमिगत पार्टी में काम करते थे। उन्हें लगा कि राजस्थान में काम तभी विकसित हो सकता है जब वहाँ के नेताओं की परिकल्पना राष्ट्रीय स्तर की बने; इसी कारण वे बहुत जल्द केंद्रीय कमेटी की सदस्य हो गईं। और वास्तव में समय गुजरने के साथ वह सही साबित हुईं। उनकी एकमात्र चीज जिससे पार्टी के बहुत सारे कॉमरेड डरते थे वो था श्रीलता का कभी भी गुस्से से बिफर पड़ने वाला मिजाज, जिस पर कोई भी काबू नहीं पा सकता था। उनके अपने शब्दों में, जैसे भाप कुकर की सीटी को धक्का देती है उसी तरह उनका भी पारा अचानक चढ़ जाता, पर मिनटों में वो शांत भी हो जाता और वो साथ काम कर रहे कॉमरेडों के प्रति किसी किस्म की गुरेज नहीं रहने देतीं। एक राजनीतिक कार्यकर्ता के बतौर मैं पहली बार श्रीलता से तब मिली जब वो इंडियन पीपुल्स फ्रंट में शामिल ही हुईं थीं, यह सीपीआई (एमएल) का खुला चुनावी मोर्चा था। वो राजस्थान किसान सभा की अध्यक्ष के बतौर सक्रिय रहीं। इस बात को वो बहुत खुलकर कहती थीं कि उनके पति जो उस समय राजस्थान किसान संगठन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता भी थे, तत्काल इस फ्रंट में शामिल नहीं होना चाहते थे। पर उन्होंने धैर्य रखा और पार्टी नेतृत्व से कहा कि उन्हें समझने के लिए पर्याप्त समय दिया जाय। शुरुआत में मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि एक उच्च मध्यम वर्ग से आने वाली महिला कैसे किसानों के संगठन का नेतृत्व कर रही हैं। श्रीलता ने मुझे बताया था कि उन लोगों के साथ वो बड़े आराम काम करती हैं. पर महिलाओं के बारे में, यहाँ तक कि नेतृत्वकारी महिलाओं के बारे में भी, उन लोगों की राय बदलने में उन्हें काफी समय लगा था। झुंझनु में एक चुनावी सभा के दौरान मैंने देखा कि महिलाएं एक-एक हाथ का घूँघट काढ़कर आतीं और थोड़ी दूर हटकर बैठ जातीं, उस चटाई पर नहीं जिस पर पुरुष बैठे होते थे। हालांकि वर्गीय स्थिति के कारण श्रीलता के लिए ये सब दूसरी ही दुनिया की चीज थी पर उन्होंने इसे स्वीकारा और यह महसूस किया कि इन सब बातों पर भाषण करने का कोई फायदा नहीं है कि ‘उन्हें घूँघट छोड़ देना चाहिए’। उस समय उन्होंने कहा था कि ‘शायद वे उसी संस्कृति में पले-बढ़े हैं और पीढ़ियों से यही करते आ रहे हैं; तो ये उनकी गलती नहीं है। हो सकता है कि गाँव के माहौल में वे इसी तरह अधिक सहज महसूस करती हों और अगर उन्हें स्वयं सब महसूस होगा तो चीजें बदल जाएँगी’। इसलिए वो वहां न्यूनतम सहायता मूल्य, जल-संकट, सस्ती दर पर सहूलियतें और बिजली जैसे मुद्दों पर बात करती रहीं। वहाँ उन्होंने एग्रो-व्यापार में शामिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट, किसानी के संकट के समय कर्ज माफी, जेनेटिकली मोडीफ़ाइड बीजों के खिलाफ और गांवों में मूलभूत नागरिक सुविधाओं की मांग को लेकर अपनी बात रखी। मुझे लगा उनका बोलने का लहजा अँग्रेजी जैसा है और वहाँ के स्थानीय लोगों के लिए यह बिलकुल अनजाना होगा। मैंने तो उनसे यह बात कही भी, पर ऐसा लगा कि लोगों ने उनकी बातें समझ लीं थीं। क्योंकि लोगों ने ताली बजाकर खुशी जाहिर की; उस दौरान बीच-बीच में कभी तो वे हँसते, पर कभी-कभी चुप या गंभीर भी हो जाते। 'डाकिन' शब्द पहली बार मैंने उन्हीं से सुना था, उन्होंने मुझे बताया था कि कुछ महिलाओं को गाँव में चुड़ैल या डाकिन बता दिया जाता है फिर उन्हें बाहर निकाल देते हैं। यहाँ तक कि उन्हें नंगा करना, उनका बलात्कार करना और यहाँ तक कि कई बार उन्हें मार भी डाला जाता है। उस समय टोंक जिले में धापू बाई नाम की एक आदिवासी महिला का मामला सामने आया था। उसके साथ 8 प्रभुत्वशाली लोगों ने टूटी बोतल से यौन-उत्पीडन की थी। कारण यह था कि धापू का पति स्थानीय रूप से शराब बनाता था, जो कि शराब ठेकेदारों की बिक्री को प्रभावित कर रहा था। राजस्थान महिला संगठन के बैनर तले हमने जयपुर में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। भंवरी मामले के बाद राजस्थान में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई अन्य मामले भी सामने आए थे: जिसमें जे.सी. बोस हॉस्टल में एक छात्रा का गैंग-रेप और एक जैन साधु द्वारा बलात्कार का मुद्दा जैसे कई मामले थे। बाद में श्रीलता ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मुद्दे पर एक राज्य-स्तरीय सेमिनार आयोजित किया। उसमें पीयूसीएल ने भी शिरकत की और जे.सी. बोस बलात्कार के मामले पर विस्तार से बहस हुई। यहीं पर महिलाओं के खिलाफ होने वाली तमाम तरह की हिंसा के खिलाफ एक समग्र कानून की जरूरत महसूस की गई। योजना बनी कि इस कानून का ड्राफ्ट वकीलों और महिला कार्यकर्ताओं की मदद से ऐपवा तैयार करेगा। 

राजस्थान में पुरुषों को जेंडर संबंधी नए विचारों स्वीकार कराना आसान नहीं था। कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं के परिवारों में श्रीलता ने पुरुषों को अपनी पत्नियों, बहनों और बेटियों के प्रति रवैये को बदलने के लिए तैयार करने की कोशिश की। वो मज़ाक-मज़ाक में पूछतीं, "आपके यहाँ की महिलाएं पर्दे में रहती हैं तो आपको इससे किसी तरह का फायदा मिलता है क्या? क्या ये ज्यादा बेहतर नहीं होता कि जब भी महिलाएं सामने से गुजरें तो पुरुष अपनी आँखें बंद कर लेते?' 

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला ऐसोसिएशन की अध्यक्ष होने के बतौर महिला सवालों पर श्रीलता का मार्क्सवादी नजरिया था और वो चाहती थीं कि सारा भार महिला संगठन पर छोड़ने के बजाय पार्टी भी महिला मुद्दों को उठाए। उन्हें ऐसा लगता था कि 'हम महिलाएं भी न केवल महिला संगठन में बल्कि पार्टी में भी काम कर रहे हैं, पुरुषों को यह बात समझनी चाहिए और महिलाओं की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए', महिलाओं के सवाल राजनीतिक सवाल हैं। वाम नेतृत्व वाले महिला आंदोलन को तुलनात्मक रूप से स्वायत्त ढंग से चलाकर और लगातार महिला संगठन का जमीनी स्तर तक ढांचा खड़ा कर, उन्होंने नए-नए बने ऐपवा की प्रोफाइल को उठाकर हुए उसे एक राष्ट्रीय महिला संगठन का दर्जा दिलाया। इसके लिए वो तमाम राज्यों में खुद जातीं और वहाँ की स्थानीय इकाइयों की महिलाओं से करीब से मिलती. उस दौरान अथक परिश्रम किया- यह सुनिश्चित करने के लिए कि कम-से-कम' देश भर में दस ऐसे राज्य हों, जहां महिला संगठन की स्थानीय इकाई वास्तविक रूप से जमीनी स्तर पर काम कर रही हो। वे तमाम राज्यों में कुछ महीनों के अंतराल पर एक बार जरूर जातीं और उनकी यह हमेशा यह कोशिश रहती कि कम-से-कम साल में दिल्ली में तीन से चार कार्यक्रम में हों सकें। वे निजी तौर पर कोशिश करतीं कि दूसरी धाराओं की संघर्षरत महिलाएं एपवा की इन पहलकदमियों में शामिल हों। श्रीलता इस मामले में बहुत सतर्क रहतीं कि संगठन की जीवंतता बनी रहे और वह महज ऐसा साइनबोर्ड वाला संगठन बनकर न रह जाए, जिसमें कुछ सजावटी नेता हों और जिस बात की संभावना हमेशा बनी रहती है। सभी स्तरों पर गतिशील व्यावहारिक राजनीतिक पहलकदमी बनाए रखने के लिए वह भरसक कोशिश करती रहीं। महिला बिल उनके लिए बहुत मायने रखता था और पूरे देश में इसे लेकर कई अभियान चलाये गए। ऐपवा ने विभिन्न जिलों में इस वर्कशॉप की और वर्कशॉप की इन श्रंखलाओं के दौरान इसके अलावा ‘महिलाओं पर वैश्वीकरण और सांप्रदायिकरण के प्रभाव’ जैसे विषय भी शामिल किए। उनके नेतृत्व में 'महिला श्रमिकों की समस्या' विषय पर झारखंड में और 'महिला आंदोलन व संगठन निर्माण का कार्यभार' के लिए कार्यभार' विषय पर पटना में सफल वर्कशॉप आयोजित हुई। सभी सांगठनिक बैठकों में श्रीलता का ज़ोर रहता कि शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय परिस्थितियों तथा उनका महिला आंदोलन पर असर से की जाय। और इस प्रक्रिया ने हमारी समझ को व्यापक बनाने में मदद की। संगठन की पत्रिका आधी ज़मीन और विमेंस वॉयस को निकालने और उसे नियमित बनाने में श्रीलता जी की बड़ी भूमिका थी। वो दूसरे संगठनों और राज्यों की सैकड़ों महिलाओं को ग्राहक बनाने में पूरी ईमानदारी से जुटी रहती थीं। 


ट्रेड यूनियन, मानवाधिकार और अंतर्राष्ट्रीय विभाग

श्रीलता एक्टू की एक सक्रिय सदस्य और नेता थीं और उनकी भूमिका राजस्थान तक ही सीमित न थी। दूसरे राज्यों में नेताओं के साथ समन्वय स्थापित करने और दिल्ली में कानूनी जानकारों और वरिष्ठ वकीलों के अपने नेटवर्क के माध्यम से वो उनकी मदद करती रहती। श्रम मंत्री से मिलने वाले केन्द्रीय प्रतिनिधि मंडल में अक्सर वे शामिल रहतीं। असम में सेना द्वारा की जा रही ज़्यादतियों और आर्म्स फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट, बिहार में पुलिस आतंक, झारखंड में क्रांतिकारी वाम आंदोलन के इलाकों में बलात्कार व हत्या और सिंगूर नंदीग्राम में राज्य दमन जैसे मुद्दों पर मानवाधिकार कमीशन या गृह मंत्री से मिलने वाले संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में मैं भी उनके साथ रहती। उन्होंने नेपाल, बांगलादेश, पाकिस्तान, म्यामार, आस्ट्रेलिया, स्वीडन, कनाडा आदि देशों में वामपंथी नेताओं के साथ एक मजबूत संबंध कायम किया था और इससे इन देशों की महिला प्रतिनिधियों को दिल्ली में आयोजित ऐपवा सम्मेलन में बुलाने में मदद भी हुई। 


वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में विश्वास

हर उम्र की महिलाओं से संवाद स्थापित करने में श्रीलता बहुत कुशल थीं। एक बार वो इलाहाबाद आईं थीं, उस समय उन्होंने मेरी माँ से पढ़ने में उनकी रुचि और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों पर उनके विश्वास के बारे में बातें की थीं। हमारे घर का पसंदीदा 'नीम पकौड़ा', उन्हें भी बहुत पसंद आया था। इमली के पेस्ट से करेला बनाना मैंने उनसे ही सीखा था। मुझे याद है श्रीलता कहा करतीं थीं कि यह सही है कि गांवों में अधिकतर आदिवासी लोगों में अंधविश्वास होता है पर सेहत की देखभाल के मामले में वे बहुत संवेदनशील लोग हैं इसलिए उनसे एकसाथ अलग-अलग भाषाओं में बात करनी पड़ती है- एलोपैथिक दवाओं से उन्हें डर लगता है इसलिए स्थानीय गाँव के डॉक्टर उनके इलाज के लिए स्थानीय औषधियों का इस्तेमाल करते हैं। उनके साथ संपर्क के जरिये ही श्रीलता ने आम बीमारियों का प्राकृतिक इलाज सीखा था और गांवों में अपने काम के दौरान इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल भी करती थीं। इसी संदर्भ में उन्होंने स्वमूत्र चिकित्सा विधि के अपने प्रयोग का जिक्र किया। उन्होंने मुझे बताया था कि कैसे उन्होंने इसकी आधारभूत समझ बैसवाड़ा जिले के भील आदिवासियों से हासिल की थी और बाद में इस विषय पर उन्होंने मोरारजी देसाई से प्राप्त कई किताबें पढ़ीं।

इस इलाज से उन्हें काफी मदद मिली, और इसी से उन्होंने अपनी किडनी फेल होने करने के कारण आई सूजन और घाव को भी ठीक किया। उनका इस बात में विश्वास था कि एलोपैथिक दवाइयाँ लक्षणों के आधार पर इलाज करती हैं पर इसके दीर्घकालिक परिणाम बुरे होते हैं, एक बार मेरी उनसे इस पर लंबी बहस भी हुई थी। उनका मानना था कि अलावा इसके दवा उद्योग भयानक मुनाफा बना रहे हैं, वे मरीज पर लंबी अवधि में पड़ने वाले बुरे प्रभाव की तनिक भी चिंता नहीं करते; और ये बहुत मंहगे और आम पहुँच से बाहर होते हैं। इससे संबन्धित उनका लेख My Incredible Recovery Story’ http://detox.net.au/detox/urine-therapy/my-incredible-recovery-story/ पर उपलब्ध है; उन्होंने असाध्य बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की मदद के लिए इसे साझा किया है।

श्रीलता नए विचारों का हमेशा स्वागत करती थीं और साथ ही एक अनुशासित कम्युनिस्ट भी थीं। मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग में पले-बढ़े कॉमरेडों में ये खासियतें एक साथ पाना मुश्किल ही होता है। मैं खुशकिस्मत हूँ कि मुझे अपनी सक्रियता के स्वर्णिम दस साल उनके साथ बिताने का मौका मिला। एक प्यारी दोस्त और ईमानदार साथी के रूप में उनकी याद मेरे जेहन में हमेशा ताजा रहेगी।

(पुनश्च: इस लेख के लिखे जाने के बाद मुझे याद आया कि आपातकाल के दौरान श्रीलता ने जेल की सलाखों के पीछे काफी यातनाएं भी सहीं थीं जिसकी चर्चा उन्होंने विस्तार से मेरी मित्र सविता सिंह से एक साक्षात्कार में की है।) 

- कुमुदिनी पति

(मेनस्ट्रीम अंक-5, मार्च 18, 2017 से साभार अनुवादित)

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