नफरत, दमन और हिंसा के खिलाफ समान अधिकार की दावेदारी तेज करो!

ऐपवा स्थापना दिवस
12 फरवरी 2018
नफरत, दमन और हिंसा के खिलाफ
समान अधिकार की दावेदारी तेज करो!

11-12 फरवरी 1994 को ऐपवा का स्थापना सम्मेलन दिल्ली में हुआ था. इसमें कई राज्यों व क्षेत्रों में कार्यरत महिला संगठनों ने मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोएिसशन (ऐपवा) का गठन किया और खुद को इसमें समाहित कर दिया. साथ में, कुछ विशिष्ट पहचान रखने वाले जैसे जनजातीय व अल्पसंख्यक समुदाय की महिला संगठनों को ऐपवा के संबद्ध संगठन का प्रावधान भी बना कर रखा गया. अपने गठन के बाद के इन 24 वर्षों में ऐपवा ने अपने संघर्षों के बल पर देश स्तर पर एक अलग पहचान बनाई है.

आज ऐपवा का स्थापना दिवस मनाते हुए हम देश में एक खतरनाक दौर देख रहे हैं. सदियों के संघर्ष से हासिल और महिलाओं के अधिकार और सीमित आजादी को भी आज कुचला जा रहा है. संविधान प्रदत राजनैतिक अधिकारों को नकारा जा रहा है. आज खाप पंचायतों, मनुस्मृति और भाजपा-आरएसएस के नेताओं की समझ के अनुसार महिलाओं के अधिकार-कर्तव्यों की सीमा रेखा निर्धारित की जा रही है और इसके अनुसार ‘स्त्रीधर्म’ दिखाने के लिए महिलाओं पर दमन व हिंसा की जा रही है. दलित व अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के खिलाफ नफरत फैलाने और उन पर हिंसा और अन्याय व अत्याचार को जायज ठहराया जा रहा है. विडम्बना यह है कि यह प्रतिगामी क्रूरता महिलाओं के सम्मान, भारतीय संस्कृति आदि के नाम पर की जा रही है.

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में लोकतंत्र के लिए और महिला अधिकारों के लिए चले लंबे आंदोलनों ने महिलाओं की जीवन स्थिति, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सत्ता में भागीदारी आदि के प्रश्न को राजनीतिक एजेंडे में शामिल करने और दुनिया के देशों को इस सवाल पर जवाबदेह बनने के लिए बाध्य किया है. लेकिन अंतराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले आकलन में भारत अब भी दुनिया के सबसे निचले स्तर पर है. इस राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते महिला सशक्तीकरण के नाम पर मजबूरी वश कुछ कदम सरकारों को उठाना पड़ता है, लेकिन भाजपा की सरकार ने इसे भी जुमलेबाजी में बदल दिया है. इनका बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं ऐसा ही एक जुमला सिद्ध हुआ है. व्यवहार में इस सरकार की नीतियां लड़कियों को जीवन और शिक्षा के प्रति संवेदनशील नहीं है. इस बार के बजट में यह और भी साफ तौर पर दिख रहा है. इस बार जेंडर बजटिंग की कोई चर्चा भी नहीं है. इस बार शिक्षा का बजट घटा दिया गया है. मनरेगा राशि में बढ़ोतरी नहीं की गयी है. महिलाओं पर बढ़ती हिंसा को रोकने और उनकी सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है. 10 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत करने की घोषणा अव्वल तो लफ्फाजी है, क्योंकि इसे मुताबिक फंड आवंटित नहीं किया गया है और जो पैसा दिया भी गया है, वह गरीबों-महिलाओं के हित की बजाए प्राइवेट अस्पतालों के लूटने के लिए है. महिलाओं के लिए तो सस्ती दवायें और हर पंचायत में साधनयुक्त सरकारी अस्पताल की जरूरत है, जहां आसानी से पहुंचकर विश्वसनीय तरीके से अपना इलाज करा सकें. स्कीम वर्करों, आशा, रसोइया, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की बजट में घोर उपेक्षा की गई है. यह बजट जब आया है, उसके कुछ ही दिन पहले दावोस सम्मेलन के अवसर पर आॅक्सफेम ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके अनुसार हिंदुस्तान समावेशी विकास के मामले में काफी पीछे है. अमीर गरीब की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है. एक प्रतिशत धनिकों के पास देश की 73 प्रतिशत संपत्ति है, लेकिन सरकार ने गरीबों की आय बढ़ाने और युवाओं को रोजगार देने से इंकार कर पूंजीपतियों और निजी घरानों को टैक्स में छूट की घोषणा कर दी है.

महिलायें भूली नहीं हैं कि दिसंबर 12 की घटना के बाद शुरू हुआ महिलाओं और नौजवानों का आंदेालन साल 2013 में भी प्रचंड रूप से जारी रहा और 2014 में भाजपा को इसलिए बहुमत मिला कि इसने महिलाओं को सुरक्षा और नौजवानों को रोजगार देने का वायदा किया था. लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा दोहरी चाल चल रही है. एक तरफ यह सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं व परंपराओं को खत्म कर रही है. सारी सत्ता एक व्यक्ति प्रधानमंत्री के हाथ में संकेन्द्रित हो गई है. सीबीआई, एनआइए ही नहीं चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का वह खुला राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है. दबाव में न आने वाले जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत और इस पर अब तक जारी रवैया दिखला रहा है कि षड्यंत्रकारी लोग आज सत्ता के शीर्ष में हैं. दूसरी तरफ, आरएसएस और और इससे जुड़े दर्जनों नामधारी भगवा गिरोहों को हिंदू राष्ट्र निर्माण के नाम पर आज नागरिकों को नियंत्रित करने की खुली छूट मिली हुई है. विगत दिनों भीड़ के नाम पर हत्यायें हों, हाल की कासगंज की घटना, करनी सेना को भाजपा द्वारा सरकारों का संरक्षण जैसी अनगिनत घटनायें सिद्ध कर रही हैं कि नीचे से ऊपर तक सब एक सूत्र में बंधे हुए हैं और सबकुछ सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है. तीन तलाक के मुद्दे पर कानून बनाने का उतावलापन कहीं से मुस्लिम महिलाओं के लिए न्याय की चिंता से नहीं वरन मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक कानूनी हथियार के रूप में किया गया है. एक बार में तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलायें आवाज उठाती रही हैं. ऐपवा भी इसके समर्थन में है और सबसे विचार-विमर्श के बाद एक उन्नत-आधुनिक कानून की जरूरत है.

इस मुद्दे को सामने कर भाजपा ने बड़ी चालाकी से महिला आरक्षण बिल को पीछे धकेल दिया है, जबकि देश भर की महिलायें संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग लंबे समय से कर रही हैं. लव जेहाद के नाम पर उत्पीड़न हो या आॅनर किलिंग, क्राइम या वेलेन्टाइन डे का विरोध - महिलाओं को हिंसा के जरिए नियंत्रित करने वाली इन सत्ताधारियों के महिलाओं का सम्मान, भारत माता की जय जैसे शब्द पाखंड हैं. ये वही लोग हैं, जो उन बाबाओं और तथाकथित संतों की भक्ति करते हैं, जो महिलाओं व छोटी बच्चियों का बलात्कार करते हैं.

इसलिए आइए, आज हम ऐलान करें कि महिलाओं पर किसी भी हिंसा को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे. दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्पीड़न का हम पुरजोर विरोध करेंगे. महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अपने जीवन पर नियंत्रण के अधिकार के लिए हम संघर्ष तेज करें.

ऐपवा

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